आश्रम व्यवस्था
आश्रम शब्द की उत्पत्ति 'श्रम' धातु से हुआ है जिसका अर्थ है परिश्रम या प्रयास मूलतः आश्रम जीवन की यात्रा में एक विश्राम स्थल का कार्य करते हैं।
आश्रम व्यवस्था की उत्पत्ति
रिज डेविड्स के अनुसार आश्रमों का प्रचलन बुद्ध के बाद या त्रिपिटकों की रचना के पश्चात हुआ होगा। परन्तु इनका यह मत सही नहीं है।
सर्वप्रथम चारों आश्रमों का उल्लेख जाबालोपनिषद से प्राप्त होता है।
छांदोग्य उपनिषद मे तीन - ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ आश्रम का उल्लेख है।
चार आश्रम तथा उनके कर्तव्य
हिन्दू धर्मशास्त्र में मनुष्य की आयु 100 वर्ष मानकर प्रत्येक आश्रम की आयु 25 वर्ष निर्धारित किया गया है।
ब्रह्मचर्य आश्रम
प्रथम आश्रम तथा विद्याध्ययन का काल
इस आश्रम का प्रारम्भ उपनयन संस्कार से होता है।
गुरू के समीप रहकर विद्याध्ययन
बालकों की दिनचर्या अत्यन्त कठोर एवं पवित्र
गुरू सेवा व भिक्षानिवृत्ति द्वारा जीवन निर्वाह
धार्मिक शिक्षा प्रमुख रूप से
ब्रह्मचारी दो प्रकार के होते हैं
(i) उपकुर्वाण
- ये ब्रह्मचर्य समाप्त होने पर गृहस्थ आश्रम में प्रवेश
- गुरू को सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा
(ii) नैष्ठिक
- जीवन पर्यन्त गुरू के पास रहकर उनकी सेवा व विद्याध्ययन इन्हें 'अन्तेवासी' कहा जाता था।
- अध्ययन समाप्ति पश्चात् ब्रह्मचारी स्नान करता था यह अध्ययन के अंत का सूचक था। उसके बाद वह 'स्नातक' कहलाता था।
- ब्रह्मचर्य की अवधि प्रायः 12 वर्ष की होती थी।
गृहस्थ
ब्रह्मचर्य के बाद गृहस्थ जिसकी उम्र प्रायः 25 से 50 वर्ष मानी गई है
इसी आश्रम में रहकर मनुष्य त्रिवर्ग अर्थात धर्म, अर्थ व काम का एक साथ उपयोग करते हुए मोक्ष की प्राप्ति करता है।
विभिन्न संस्कारों का अनुष्ठान इसी आश्रम में (कुल संस्कार-16)
- ऋण संस्कार - गृहस्थाश्रम में ही मनुष्य ऋण से मुक्ति प्राप्त करता है जिसका विधान धर्मग्रंथों में है।
ऋण के प्रकार : शतपथ ब्राह्मण के अनुसार निम्न तीन ऋण
- देव ऋण
- ऋषि / गुरू ऋण
- पितृ ऋण
अन्य ऋण
- मनुष्य/अतिथि ऋण
- भूत ऋण
देव ऋण
जन्म के साथ ही यह ऋण चढ़ जाता है, देवी-देवताओं की कृपा के प्रति कृतज्ञता के लिए
गृहस्थाश्रम के धर्म : कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार
- धर्म के अनुकूल जीविकोपार्जन करना, विधिपूर्वक विवाह करना
- विवाहिता पत्नी से ही संपर्क रखना, देवता, पितरों की पूजा
मनुस्मृति के अनुसार गृहस्थ के दस धर्म
- धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रिय-निग्रह, ज्ञान, विद्या सत्य व क्रोध न करना।
उपरोक्त ऋणों से मुक्ति के बाद ही मोक्ष की प्राप्ति होती है ऐसा माना गया है।
वानप्रस्थ आश्रम
- गृहस्थाश्रम के बाद वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश
- कुल, गृह, ग्राम को छोड़कर वन में निवास तथा इन्द्रियों पर नियंत्रण
- कुछ ग्रंथों में वानप्रस्थ के लिए 'वैखानस' शब्द का प्रयोग
- आयु 50 वर्ष से 75 वर्ष, यदि इसके नियमों का पालन करते हुए मृत्यु हो जाती थी तो वह मोक्ष को प्राप्त होता था।
संन्यास आश्रम
- वानप्रस्थ के बाद यह अंतिम आश्रम
- संन्यास आश्रम का मूल लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति था जीवन निर्वाह के लिए वह दिन में एक बार भिक्षा माँग सकता था।
- वह ग्राम में एक रात व नगर में पाँच रातों तक ठहर सकता था
- अवस्था 75 से 100 वर्ष , कठोर तपस्या से समस्त पापों का नाश
- चारों आश्रमों का विधान केवल 'द्विज' के लिए था जबकि शूद्र के लिए केवल गृहस्थाश्रम बताया गया है।

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