कोल जनजाति की सांस्कृतिक परंपराएं
- नृत्य
- उत्सव एवं पर्व
- भाषा
नृत्य एवं संगीत
- कोल जनजाति नृत्य प्रिय जनजाति है।
- इनका प्रमुख नृत्य कोलदहका हैं इसके अलावा केहरा, दौतलिया, नारदी आदि नृत्य हैं।
- कोल जनजाति को संगीत भी अत्यधिक प्रिय है यह मुख्य रूप से सोहर गीत, विवाह गीत, नरती गीत, दादर गीत, भगत गीत, फाग कजली टप्पा और देव गीतों का गायन करते हैं।
कोल जनजाति के प्रमुख नृत्य
- कोलदहका - कोलदहका कोल जनजाति का प्रिय नृत्य है। कोल जनजाति खुशी के सभी अवसरों पर यह नृत्य करती हैं इसे कोलहाई नृत्य भी कहते हैं
- केहरा - इसका प्रचलन बघेलखण्ड में है, केहरा में स्त्री और पुरूष दोनो अलग-2 शैली में नाचते हैं
- दौतलिया नारदी नृत्य - स्त्रियों द्वारा किया जाने वाला नृत्य
राज्य स्तरीय कोल जनजाति विकास अभिकरण
गठन - 6 जून 2011
उद्देश्य - कोल जनजाति के विकास के लिए पृथक रूप से शैक्षणिक व आर्थिक विकास जिला स्तर पर कोल जनजाति के विकास के लिए जनजातीय विकास प्रकोष्ठ का गठन
कोल जनजाति के प्रमुख गीत
- सोहर गीत - बच्चों के जन्म के समय गाए जाते हैं
- विवाह गीत - वैवाहिक समारोह में गाए जाने वाले गीत जैसे सुहाग, गारी सजनई आदि
- दादर गीत - बारात आगमन पर पुरुषों द्वारा गाया जाने वाला गीत
- भगत गीत - नवरात्रि में गाए जाने वाले भगत गीत
- फाग - होली के अवसर पर गाए जाने वाले गीत
उत्सव एवं पर्व
कोल जनजाति के प्रमुख उत्सव/पर्व दिवाली, हरियाली, अमावस्या, नाग पंचमी, जन्माष्टमी, तीज, नवदुर्गा, खीचरहाई, शिवरात्रि (मकर संक्राति) नवरागी आदि हैं।
पर्व/त्यौहार - विशेषताएँ
- हरियाली अमावस्या - यह सावन के महीने में मनाया जाता है इस दिन भगवान के सामने सुखी जीवन जीने की कामना करते हैं
- नागपंचमी - इस दिन नागदेवता को दूध पिलाकर पूजा की जाती है।
- जन्माष्टमी - भगवान श्रीकृष्ण के जन्म दिवस को धूमधाम से मनाया जाता है।
- हरतालिका तीज - इस दिन को कोल महिलाएँ निर्जला व्रत रखती हैं और हिन्दुली - कजली गीत गाती हैं।
- खिचरहाई - कोल जनजाति में मकर सक्रान्ति पर्व को खिचरहाई कहते हैं।
- नवाखानी - नई फसल (धान) के आने पर यह त्यौहार मनाया जाता है।
भाषा
कोल जनजाति द्वारा कोल, मुण्डा एवं बघेली भाषा बोली जाती है मध्य प्रदेश के विभिन्न जिलों में कोलों द्वारा भिन्न-भिन्न बोलियाँ बोली जाती हैं जिनमें सतना में बुन्देली मिश्रित बघेली, सीधी में भोजपुरी मिश्रित बघेली, रीवा में बघेली, शहडोल, मंडला एवं राजगढ़ में छत्तीसगढ़ी मिश्रित बघेली आदि।

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