कोल जनजाति
- परिचय
- भौगोलिक विस्तार
- मूल स्थान
- उत्पत्ति
- जनसंख्या
- ऐतिहासिकता
- शारीरिक विशेषता
परिचय
- कोल जनजाति मुण्डा समूह की अत्यन्त प्राचीन जनजाति है।
- कोल, भील व गोण्ड जनजाति के बाद मध्य प्रदेश की तीसरी बड़ी जनजाति है।
- कोल जनजाति आस्ट्रिक परिवार समूह से संबधित है।
- मैक्स मूलर ने कोल जनजाति को कोल या कोलेरियन कहा है।
भौगोलिक विस्तार
कोल जनजाति मध्य प्रदेश के बघेलखण्ड क्षेत्र के सीधी, शहडोल, सतना, जबलपुर आदि जिलों में निवासरत है
इसके अतिरिक्त राजगढ़ और मण्डला जिले में भी इनकी संख्या निवास करती है।
मूल स्थान
मध्य प्रदेश के रीवा जिले के वरदीराजा क्षेत्र के कुलारी गांव को ये अपना मूल स्थान मानते हैं।
ऐसी मान्यता है कि कोल जनजाति के पूर्वज रीवा रियासत के स्वामी थे।
उत्पत्ति
- कोल का शाब्दिक अर्थ है - मानव। कोल और कोरकू दोनों मुंडरी भाषा परिवार के शब्द हैं।
- कोल जनजाति का उल्लेख ऋग्वेद, रामायण, महाभारत, पुराण आदि में भी मिलता है।
- यह खरवार समूह की एक प्राचीन जनजाति है, यह अपना संबंध राम भक्त शबरी माता से मानते हैं। महर्षि पाणिनी के अनुसार कोल शब्द 'कुल' से निकला है जो समस्त का भाव बोधक है
- पुराणों में विष्णु पुराण, हरिवंश पुराण, अग्नि पुराण और मत्स्य पुराण में भी कोलों का उल्लेख हुआ है।
जनसंख्या
कोल जनजाति की जनसंख्या जनगणना 2011 के अनुसार लगभग 11.67 लाख है जो प्रदेश की कुल जनजाति जनसंख्या का 7.6% है।
कोल जनजाति उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, असम, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ सहित अन्य राज्य में भी निवास करती है।
ऐतिहासिकता
- तुलसीदास ने रामायण में कोल किरातों का वर्णन किया है
- महाभारत में मायावी कोल राजा का वर्णन है जो अपने गलत कार्यों की वजह से 'कोल दैत्य' कहलाता था।
- ऐसी मान्यता है कि विंध्य क्षेत्र के राजा तुर्वसु को दक्षिण पूर्व का रेवा देश दिया गया जो वर्तमान में रीवा है
- माड़ा के कोल राजा मड़निहा ने अकबर और महाराणा प्रताप के मध्य हुए युद्ध में महाराणा प्रताप की सहायता की।
- त्योंथर (रीवा) में वर्तमान समय में कोल राजा के गढ़ी के अवशेष हैं। त्योंथर का पुराना नाम शेरगढ़ था।
शारीरिक विशेषता
कोल जनजाति का कद मध्यम, रंग काला, ओठ मोटे व बाल घुंघराले होतें हैं।

Comments
Comment करें