सहरिया जनजाति की सामाजिक परंपराएं
- जन्म संस्कार
- विवाह
- मृत्यु संस्कार
जन्म संस्कार
सहरिया जनजाति में शिशु जन्म को उत्सव के रूप में मनाया जाता है इस जनजाति में लड़की के जन्म को शुभ माना जाता है।
शिशु के जन्म के बाद गेलहरी माता को मुर्गी के बच्चे की भेंट/बलि दी जाती है।
विवाह
सहरिया जनजाति में विवाह की प्रथा कठोर नहीं है तथा युवक व युवतियों को अपना साथी चुनने की स्वतंत्रता है।
विवाह प्रथाएँ
- सगाई विवाह
- झाड़ - फेरा विवाह
- झगड़ा विवाह
- विधवा विवाह
- खेका विवाह
सीताबाड़ी
मध्य प्रदेश व राजस्थान की सीमा के पास कोटा जिले में सीताबाड़ी नामक स्थान पर सहरियाओं के वार्षिक मेला का आयोजन होता है जहाँ युवक व युवतियाँ अपना जीवन साथी चुन सकते हैं।
सहरिया जनजाति के प्रमुख विवाह
| विवाह का प्रकार | विवरण |
|---|---|
| सगाई विवाह | • इस विवाह में दोनों पक्ष की सहमति से पहले सगाई की जाती है और उसके बाद विवाह कर दिया जाता है। |
| झगड़ा विवाह | • जब कोई पुरुष किसी स्त्री को भगाकर ले जाता है तब परिवार वाले उन्हें ढूंढते है, मिलने पर उनका विवाह कर दिया जाता है। |
| विधवा विवाह | • सहरिया में विधवा पुनर्विवाह का प्रचलन है विधवा पुनर्विवाह का पहला हक देवर का होता है। |
| झाड़-फेरा विवाह | • जब लड़की का पिता प्रलोभन में आकर लड़की का रिश्ता कहीं और कर देता है तब अपनी प्रतिष्ठा के लिए लड़के वाले लड़की का अपहरण कर जबरदस्ती विवाह कर देते हैं। |
| सवर विवाह | • इस विवाह को पंच व परिवार वाले सम्पन्न करवाते हैं। |
| खेका विवाह | • इसमें विधवा द्वारा अविवाहित पुरुष से विवाह किया जाता है। इसमें विधवा के घर के आंगन में खम्भा गाड़ के लड़का उसका सात फेरा लगाता है। |
मृत्यु संस्कार
- सहरिया जनजाति में दाह संस्कार व शव को दफनाने दोनों प्रथा का प्रचलन है।
- ये लोग मृत्यु को डरावना मानते हैं, लगातार या अस्वाभाविक तरीके से मौत होने पर सहराना अलग स्थान पर बसा लेते हैं।
- मृतक के संस्कार के तीसरे दिन अस्थियों के एकत्रण को घास-माटी कहा जाता है।
- मृत्यु के 12 वें दिन भोज दिया जाता है, जिसे नुक्ता खर्च कहते हैं
- मृतक के स्मृति चिन्ह के रूप में एक खूँटा गाड़ा जाता है।

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