भारिया जनजाति
- परिचय
- भौगोलिक विस्तार
- जनसंख्या
- उत्पत्ति
- विशेषता
परिचय
भारिया जनजाति मध्य प्रदेश की अत्यन्त पिछड़ी जनजातियों में से एक है।
भारिया द्रविड़ियन व कोलेरियन परिवार की जनजाति है भारिया जनजाति गोंडों की एक उपशाखा है।
भारिया जनजाति को भूमिया के नाम से भी जाना जाता है।
ये लोग गोण्डों को अपना अग्रज तथा राजा कर्णदेव को अपना पूर्वज मानते है।
भौगोलिक विस्तार
भारिया जनजाति मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा और जबलपुर में पाई जाती है।
भारिया की सबसे अधिक जनसंख्या जबलपुर में है, इनका मुख्य संकेन्द्रण छिंदवाड़ा के पातालकोट में है जहाँ ये अत्यन्त पिछड़ी जनजाति घोषित है।
पातालकोट
पातालकोट छिंदवाड़ा के सतपुड़ा पर्वत पर अवस्थित भारिया जनजाति के संकेन्द्रण का प्रमुख क्षेत्र है। पातालकोट का अर्थ है चट्टानी दीवार पातालकोट का आकार घोड़े की नाल की तरह है। पातालकोट से बहने वाली प्रमुख नदी दूधी नदी है इस नदी को पातालकोट की जीवन रेखा माना जाता है। यहाँ का प्रमुख दर्शनीय स्थल राजाखोह है।
वर्ष 1981 की जनगणना में पातालकोट की भारिया जनजाति को जंगलियों के भी जंगली कहा गया।
जनसंख्या
भारिया जनजाति की जनसंख्या लगभग 193230 है। पातालकोट में रहने वाले भारिया की संख्या 4824 है।
उत्पत्ति
भारिया शब्द का अर्थ है भार ढोने वाला। भारिया जनजाति भार ढोने का कार्य करती है इसी कारण इसे भारिया कहा जाता है।
भारिया गोंड तथा पाण्डव वंश से अपनी उत्पत्ति मानते हैं।
डा० रसेल एवं हीरालाल ने भारियाओं की उत्पत्ति को महाभारत युग से जोड़ा है।
मूल स्थान
भारिया जनजाति अपना मूलस्थान महोबा अथवा बांधवगढ़ को मानती है यहां के राजा करण देव को भारिया अपना पूर्वज मानते हैं।
शारीरिक विशेषता
भारिया जनजाति का कद मध्यम, रंग काला, आंखे छोटी व नाक चौड़ी होती हैं।

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