बुन्देलखण्ड के लोकनृत्य | Bundelkhand Ke Lok nritya

बुन्देलखण्ड के लोकनृत्य

  • कानड़ा नृत्य
  • राई नृत्य
  • सैरा नृत्य
  • बधाई नृत्य
  • ढीमराई नृत्य
  • जवारा नृत्य
  • बरेदी नृत्य
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कानड़ा नृत्य

  • मुख्यतः धोबी समाज द्वारा जन्म, विवाह व मांगलिक अवसर पर।
  • भक्ति आधारित गायन पर आधारित (राम व शिव की लीलाएँ)।
  • वाद्य यंत्र - सारंगी, ढोलक, लोटा एवं सितार।

राई नृत्य

  • बुन्देलखण्ड का प्रमुख व मध्य प्रदेश का राजकीय नृत्य।
  • इस नृत्य में श्रृंगार व शौर्य दोनों मनोवृत्तियों का समावेश।
  • इस नृत्य में केन्द्र में बेड़नी नर्तकी होती है, वाद्ययंत्र - मृदंग।
  • मध्य प्रदेश की ज्ञानेश्वरी ने इसे अंतर्राष्ट्रीय पहचान दी।
  • इस नृत्य को बढ़ावा देने के लिए राम सहाय को 2022 में पद्मश्री।

सैरा नृत्य

  • खरीफ की बुआई के समय विशेष रूप से कजरी तीज में।
  • पुरुष प्रधान नृत्य।
  • मंजीरा, ढोलक, मृदंग, बाँसुरी एवं टिमकी वाद्य यंत्र का प्रयोग।

बधाई नृत्य

  • ग्रामीण क्षेत्रों में जन्म, मनौती पूर्ण व तीज के अवसर पर।
  • बासुरी, ढपला, रमतूला एवं टिमकी आदि वाद्य यन्त्रों का प्रयोग।

ढीमराई नृत्य

  • ढीमर जाति के लोगों द्वारा विवाह व नवरात्रि के अवसर पर।
  • भक्ति व श्रृंगार प्रधान गीतों का चलन।
  • कत्थक से मिलता जुलता नृत्य।
  • इस नृत्य की विशेषता 'पदचालन' है।

जवारा नृत्य

  • समृद्धि के उत्सव के रूप में इस नृत्य का आयोजन।
  • कृषक समुदाय द्वारा फसल कटाई के अवसर पर।
  • स्त्रियां सिर पर गेहूँ के उगे हुए जवारा टोकरी लेकर नृत्य करती है।

बरेदी नृत्य

  • दीवाली के अवसर पर ग्वाला व गुर्जर जाति द्वारा।
  • नृत्य से पूर्व कविता का आयोजन जिसे दीवारी कहते हैं।
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Kartik Budholiya

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मध्य प्रदेश की ऐतिहासिक विरासत, भूगोल, कला-संस्कृति और सामान्य ज्ञान के विशेषज्ञ Kartik Budholiya छात्रों को MPPSC, MPESB (Vyapam), MP Police, Patwari, Forest Guard और अन्य राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दिलाने के लिए निरंतर शोध-परक कंटेंट साझा करते हैं।