जनजातियों से सम्बन्धित संग्रहालय एवं प्रकाशन
मध्यप्रदेश में जनजातियों से संबंधित संग्रहालय
मध्य प्रदेश में जनजातियों से संबंधित निम्नलिखित संग्रहालय है-
श्री बादल भोई आदिवासी संग्रहालय
- मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी बादल भोई के नाम पर प्रदेश में विविध आदिवासी लोकाचार को बढ़ावा देने व संरक्षित करने के उद्देश्य से 20 अप्रैल 1954 को की गई।
- वर्ष 1975 में इसे राज्य संग्रहालय नाम दिया जिसको 8 सितम्बर 1997 को फिर से बदलकर श्री बादल भोई जनजातीय संग्रहालय रख दिया गया।
- संग्रहालय के 11 कमरों में 2000 से अधिक आदिवासी कलाकृतियाँ 'गोत्र' और चिन्ह के माडल से प्रदर्शित किए गए हैं।
- 15 अगस्त 2003 को इसे सभी पर्यटकों के लिए खोल दिया गया। इस संग्रहालय में इस जिले में रहने वाले जनजातीय लोगों से जुड़े संरक्षित घरों के भण्डार और अनोखी वस्तुएँ संरक्षित हैं।
- यहाँ जनजातीय समुदायों की संस्कृति व परम्परा भी देखने को मिलती है।
- प्रति वर्ष 100000 से भी अधिक घरेलू और अन्तर्राष्ट्रीय आगन्तुक संग्रहालय में आते हैं।
जनजातीय संग्रहालय भोपाल
- इसकी स्थापना वर्ष 1964 में की गई थी तथा नए जनजातीय संग्रहालय की स्थापना राजधानी भोपाल के श्यामला हिल्स पर 6 जून 2013 को की गई।
- यह जनजातीय संग्रहालय 'रेवती कामथ' द्वारा डिजाइन किया गया है। इस संग्रहालय का प्रतीक चिन्ह 'बिरछा' है जिसे धरती की उर्वरा शक्ति और जीवन्तता का प्रतीक माना जाता है।
- इस संग्रहालय में अलग-अलग 6 दीर्घा कलाएँ है जिसमें जनजातीय शैली को अलग-अलग चित्रों व वस्तुओं के माध्यम से दर्शाया गया है।
- यह संग्रहालय अलग-अलग थीम दीर्घाओं में विभिन्न जनजातियों जैसे - गोण्ड, भील, कोरकू, बैगा, भारिया, सहरिया और कौल जनजातियों की बात करती है।
- इनमें कला, संस्कृति, परम्परा, जीवन उपयोगी शिल्प चित्र, रहन सहन व रीति-रिवाज शामिल है।
मध्य प्रदेश जनजातीय संग्रहालय का संचालन मध्य प्रदेश का संस्कृति विभाग करता है।
जनजातीय संग्रहालय के अतिरिक्त संस्कृति विभाग द्वारा तीन अन्य संग्रहालयों (तुलसी शोध संस्थान, त्रिवेणी तथा आदिवर्त आदि) का संचालन किया जाता है।
संग्रहालय की दीर्घाएँ
इसमें 6 दीर्घाएँ हैं जो निम्नलिखित है।
सांस्कृतिक वैविध्य
इस दीर्घा का निर्माण राज्य की विशिष्टता को स्थापित करने तथा उसकी बहुरंगी, बहुआयामी संस्कृति को बेहतर रूप से प्रदर्शित करने के लिए किया गया है।
जीवन शैली
इसमें राज्य के लोगों की जीवन शैली को प्रदर्शित किया गया है।
दीर्घा एक से दो में प्रवेश करने के लिए जिस गलियों से गुजर कर जाना होता है उस स्थान पर एक विशालकाय अनाज रखने की कोठी बनाई गई है।
कलाबोध
इसमें जीवन चक्र से जुड़े संस्कारों और ऋतु चक्र से जुड़े गीत-पर्वों मिथकों अनुष्ठानों का प्रदर्शन किया जाता है।
देवलोक
इस दीर्घा में यह प्रदर्शित किया गया है कि किस प्रकार संकेतों-प्रतीको के माध्यम से आदिवासी समाज ने देवलोक का वर्णन किया है।
छत्तीसगढ़ दीर्घा
इसमें अतिथि राज्य के रूप में छत्तीसगढ़ की आदिवासी संस्कृति का वर्णन है।
रक्कू दीर्घा
बचपन से संबंधित खेलों की प्रर्दशनी
'आदिवर्त' मध्य प्रदेश जनजातीय एवं लोक कला राज्य संग्रहालय
- आदिवासी संस्कृति को संरक्षित करने और आदिवासी लोक कलाको विकसित संरक्षित व बढ़ावा देने के लिए खजुराहो (मध्य प्रदेश) में 'आदिवर्त' जनजाति संग्रहालय की स्थापना 2001 में की गई।
- संग्रहालय के नये रूप का लोकार्पण 22 फरवरी 2023 को शिवराज सिंह चौहान द्वारा किया गया।
- पर्यटकों को जनजातीय संस्कृति से परिचित कराने के लिए संस्कृति विभाग द्वारा सांस्कृतिक गांव का निर्माण।
- कोरकू, बैगा, गोण्ड, भारिया एवं सहारिया इस गांव मे अपने पारम्परिक तरीके से रहेंगे। काष्ठ शिल्पियों ने खेत व गेहूँ बोने वाला हल भी तैयार किया है।
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय
- स्थापना - 21 मार्च 1977, नई दिल्ली।
- वर्ष 1979 में इसका स्थानांतरण भोपाल में कर दिया गया।
- मुख्य उद्देश्य- भारत की लोक कला, अनुसूचित जाति व जनजाति का समग्र विकास, मानव सभ्यता के विकास व उद्भव की कहानी का प्रदर्शन।
सहरिया जनजाति संग्रहालय
- स्थापना - 1990, श्योपुर में।
- संग्रहालय के गठन की अनुशंसा तत्कालीन ग्वालियर - चम्बल के कमिश्नर रहे श्री अजय शंकर ने की थी।
- सम्पूर्ण भारत में यह एकमात्र सहरिया संग्रहालय है।
रानी दुर्गावती संग्रहालय
- स्थापना - 1976 ई., जबलपुर में।
- इसमें कल्चुरी और गोण्ड राज्य की सुरसामग्री को सहेज कर रखा गया है।
राजा शंकर शाह संग्रहालय
- जबलपुर में स्थित।
- इसमें जनजातीय नायकों से संबंधित कहानियाँ, अभिलेख व शोध कार्य को प्रदर्शित किया गया है।
टंट्या भील संग्रहालय
- खण्डवा में स्थित।
- इसमें टंट्या भील व भीमा नायक की प्रतिमा रखी है साथ ही साथ उनके जीवन पर आधारित चित्रों की प्रर्दशनी लगाई गई है।
मध्य प्रदेश में जनजातियों से संबंधित प्रमुख प्रकाशन
वन्या प्रकाशन
स्थापना - 25 मार्च 1980 को मध्य प्रदेश शासन, आदिम जाति, अनुसूचित जाति एवं पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग के रूप में हुई।
पंजीयन
फर्म्स एवं सोसायटीज मध्य प्रदेश भोपाल द्वारा।
प्रमुख उद्देश्य
- आदिवासी संस्कृति से संबंधित श्रेष्ठ साहित्य को आदिवासी समाज में पहुँचाना।
- नव साक्षर एवं शिक्षित आदिवासियों के लिए श्रेष्ठ साहित्य के क्रय-निर्माण प्रकाशन व वितरण।
- श्रेष्ठ साहित्य व पाठ्य पुस्तकों का प्रकाशन।
- मूल्यवान पुराने अभिलेख का प्रकाशन व पूर्व प्रकाशित दुर्लभ साहित्य का पुर्नप्रकाशन।
आदिवासी क्षेत्रों में अनुसंधान सामग्री का प्रकाशन
- भारतीय संस्कृति व महापुरुषों से संबंधित चुनी हुई सामग्री का प्रकाशन व पूर्व प्रकाशित सामग्री का मूल प्रकाशकों से अनुबंध कर प्रकाशन तथा आदिवासी क्षेत्रों में उनका वितरण।
- अन्य प्रकाशकों के द्वारा प्रकाशित चुनी गई पुस्तकों को आदिवासी क्षेत्रों, छात्रों तथा संस्थाओ के खरीद एवं वितरण तथा उनके विशेष संस्करणों का प्रकाशन।
- आदिवासी संस्कृति का अनुरक्षण व प्रसार के लिए उपरोक्त सामग्री का संकलन व प्रकाशन।
- कल्याणकारी योजनाओं को कार्यान्वित करना जिससे अनुसूचित जाति, आदिवासी छात्र/छात्राओं का शैक्षणिक स्तर उन्नयन हो सके तथा इसे निमित्त दान व आर्थिक सहयोग देना।
- राज्य कैबिनेट ने प्रधानमंत्री जनजाति आदिवासी न्याय महाभियान (पीएम-जनमन) में स्कूली शिक्षा विभाग के अर्न्तगत पिछड़ी जनजाति बाहुल्य क्षेत्र मे निवासरत बच्चों के लिए गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा प्रदान करने का निर्णय लिया है।
प्रमुख जनजातीय पत्र तथा पुस्तिकाएँ
चौमासा
- यह ग्राम्य कलाओं, परम्पराओं, वाचिकता एवं अन्य संस्कृति रूपों पर केन्द्रित 'चौमासिक पत्रिका' है।
- इसका प्रकाशन जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी, मध्य प्रदेश संस्कृति परिषद द्वारा 1983 से निरन्तर।
गोण्ड गीत
- प्रकाशन 2003 से जनजातीय लोक कला व बोली विकास अकादमी द्वारा।
- करहवा, बिरहा, ददरिया, सैला, रीना, करमा इनके प्रमुख गीत हैं जो त्यौहार से पूजा तक के लिए रचित हैं।
- पुस्तक गोण्ड गीत में मध्य प्रदेश की गोण्ड जनजाति को न सिर्फ सहेजने बल्कि गीतों की लोक में उपस्थिति के आशय को भी स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है।
मोघिया
- प्रकाशन 2019 से जनजातीय लोक कला व बोली विकास अकादमी द्वारा।
- मध्य प्रदेश के घुमन्तू समुदाय 'मोघिया' के जीवन, संस्कृति व मान्यताओं पर आधारित है ये पुस्तक।
- इस पुस्तक में मोघिया समुदाय की सशक्त पंचायत व्यवस्था और उसके निर्णयों में लोकानुभव की कहावतें, मुहावरें, कथाओं, गाथाओं व पहेलियों का उपयोग उनके मौखिक साहित्य को समृद्ध बनाए रखने का सशक्त माध्यम सदियों से रहा है।
- इसके अलावा मोघिया समाज का नृत्य गान, जड़ी बूटियों का ज्ञान, वन्य जीवों के शिकार की कुशलता व वनस्पति की पहचान व लाभ-हानि के ज्ञान के बारे में भी बताया गया है।
आदिमजातीय अनुसंधान और विकास संस्थान, मध्य प्रदेश सरकार के महत्वपूर्ण प्रकाशन
जनजातियों की जीवन, संस्कृति एवं अन्य प्रासंगिक विषयों पर केन्द्रित अनुसंधान मूल्यांकन व अध्ययन संबंधी प्रतिवेदनों के अलावा छः माही शोध पत्रिका का बुलेटिन का प्रकाशन। जिसमें कुछ निम्नलिखित हैं।
- आदिवासी धरोहर 2003, हिन्दी शब्द कोश (गोण्डी, भीली, कोरकू), कोरकू व भीली व्याकरण (2013), जनजातीय चित्रीय शिल्प, 2017, हिरौन्दी मुन्दरी 2017, जनजातीय वाद्य 2020, गोण्ड पेण्टिंग, 2020, मवासी हिन्दी शब्दकोश 2020, परम्परागत जनजातीय बाँस शिल्पकला, 2020 मवासी जनजाति के पारम्परिक लोकगीत, 2021 मध्य प्रदेश के जनजातीय नृत्य, 2021

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