जनजातीय पर्व/उत्सव एवं त्यौहार
जनजातियाँ या आदिवासी समुदाय उत्सवधर्मी होते हैं इनके जीवन में उत्सवों का महत्वपूर्ण स्थान होता है। कुछ प्रमुख पर्व निम्न हैं-
काकसार
- स्त्री व पुरुष को एकान्त प्रदान करने वाला आदिवासियों का प्रमुख पर्व।
- जब तक वर्षा की फसलों में बालिया नही फूटती तब तक अबूझमाड़िया स्त्री पुरुषों में एकान्त में मिलना वर्जित होता है।
- काकसार उनके इस व्रत तोड़ने का उपयुक्त अवसर होता है।
- कई अविवाहितों के लिए श्रेष्ठ जीवन साथी चुनने में सहायक।
रतन्नवा
- मण्डला जिले के आदिवासियों का प्रमुख त्यौहार।
- इसमें बैगा आदिवासी मधुमक्खी की पूजा करते हैं।
- इस पर्व का सम्बन्ध आदिपुरुष नागा-बैगा से बताया जाता है।
लारूकाज
- गोण्डों का नारायण देव के सम्मान में मनाया जाने वाला पर्व।
- सुअर के विवाह का प्रतीक, इसमें सुअर की बलि दी जाती है।
- परिवार के सुख व समृद्धि के लिए यह आयोजन आवश्यक।
मड़ई
मुख्य रूप से दक्षिणी मध्य प्रदेश में।
इसमें देवी के समक्ष बकरे की बलि दी जाती है।
करमा
उराँव जनजाति का त्यौहार।
धान की फसल रोपने को तैयार हो तब यह उत्सव मनाते है व करमा नृत्य करते हैं।
सरहुल
- उराँव जनजाति का त्यौहार, इसमें प्रतीक रूप मे सूर्य व धरती का विवाह रचाया जाता है।
- होली के सात दिन पहले मनाते है इसमें भगोरिया उत्सव होता है।
भगोरिया
- भगोरिया भील व भिलाला द्वारा मनाया जाता है, दो भील राजाओं कासूमरा व बालून ने भगोर मेले का आयोजन शुरू किया था।
- इसमें आदिवासियों को जीवन साथी चुनने का अवसर।
- झाबुआ व अलीराजपुर में भगोरिया सर्वाधिक प्रसिद्ध।
मेघनाथ
गोण्ड आदिवासियों का पर्व, फाल्गुन माह के पहले पक्ष में।
गोण्डों के सर्वोच्च देवता।
नवान्न
- बुन्देलखण्ड में फसल पकने पर दीवाली के 11वें दिन गोण्ड द्वारा।
- गन्ना व ज्वार की पूजा तथा गाय को नए अनाज की रोटी।
- इस दिन गोण्ड पहले साल वृक्ष तथा भवानी माता, हालेरा देव और रातमाई को धान अर्पित करती है।
गणगौर
महिलाओं द्वारा निमाड़ क्षेत्र में मनाया जाने वाला उत्सव।
वर्ष मे 2 बार , तथा यह नौ दिन तक चलता है।
खिचड़ी
दीवाली के एक दिन पश्चात भारिया, गोण्ड व कोरकू द्वारा।
इसमें गाय व बैल को सजाकर खिचड़ी खिलाई जाती है।
गोल-गधेड़ो
भील द्वारा निमाड़ और मालवा क्षेत्र में मनाया जाने वाला यह उत्सव होली के समय भगोरिया उत्सव के साथ।
हिंगोट मार
- एक प्रकार का युद्ध उत्सव, दीवाली के दूसरे दिन।
- दो दल कलगी व तुर्रा भाग लेते हैं।
- इसमें युद्ध के लिए हिंगोट नारियल जैसे फल के अन्दर बारूद भरकर एक दल दूसरे दल पर फेंकता है।
चैत्रपूने
- चैत्र पूर्णिमा को मनाते हैं, मटकी पूजा नाम से जानते हैं।
- इसमें 5 या 7 मटकियों को चूना या खरिया से रंगते हैं
- इसमें देवी की प्रतिमा बनाकर पूजा की जाती है।
आसमाई
कार्य सिद्धि के लिए वैशाख द्वितीया को मनाया जाता है।
इस उत्सव में कौड़ियों की पूजा की जाती है।
कुनघुसू पूने
अषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को राज्य के कई हिस्सों में गृह वधुओं का पूजन किया जाता है।
घर की बहुओं को लक्ष्मी मानकर पूजा की जाती है।
गाय गोहरी
- यह उत्सव दीपावली के अगले दिन।
- इसमें गाय बैलों को रंगकर एक जगह एकत्र किया जाता है।
- इस दिन गाय व बैलों के खुरो से लगने वाली चोट शुभ मानी जाती है।
सुआरा
असत्य पर सत्य की जीत के उद्देश्य से राक्षस की मूर्ति पर शिव की प्रतिमा रखकर मनाते हैं।
मुख्यत: बुंदेलखण्ड में।
घड़ल्ला
- इसमें युवक युवतियाँ सामूहिक रूप से एकत्रित होकर नौरता के अवसर पर नृत्य करती हैं
- इस पर्व के समान अविवाहित युवकों द्वारा 'छला' नामक त्यौहार मनाया जाता है।
हरछठ/हलछठ
भादों महीने में कृष्ण पक्ष की षष्ठी को यह त्यौहार भगवान बलराम के जन्म दिवस के रूप में मनाते हैं।
मौरछठ
- बुंदेलखण्ड में यह पर्व भादौ माह के शुक्ल पक्ष के छठवी को मनाते हैं।
- नवदंपति अपने विवाह के समय के मौर व विवाह सामग्री को नदी में प्रवाहित करते हैं।
देउठनी एकादशी/देवउठान
- कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को।
- इसके साथ ही सगाई, विवाह, गौना व धार्मिक कार्य प्रारम्भ।
छैला
- गोण्ड जनजाति का प्रमुख त्यौहार।
- अक्षय तृतीया के समान ही मनाया जाता है।
- बुआई के समय बिदरी समारोह का आयोजन तथा इसमें ठाकुर देव को बकरी की बलि दी जाती है।
छाला
गोण्ड जनजाति के कन्याओं द्वारा मनाया जाता है।
बुन्देलखण्ड के सुआरा पर्व के समान।
रास नवा पर्व
- बैगा जनजाति द्वारा मनाए जाने वाले त्यौहारों में से एक।
- प्रति 9 वर्ष में मनाते हैं व मोहनी नामक पौधे के खिलने के साथ मेल खाता है।
- यह त्यौहार शहद निकालने की प्रक्रिया से संबंधित।
दशहरा नाच
प्रकृति की उदारता के सम्मान में बैगा जनजाति द्वारा मनाया जाता है।
रात में होने वाले उत्सव में युवा गायन व नृत्य करतें हैं इसमे युवक व युवती के बीच दोस्ती व प्रेमालाप बढ़ता है।

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