जनजातियों की भाषाएँ एवं बोलियाँ
राज्य की अनुसूचित जनजातियों को भौगोलिक आधार के साथ भाषा के आधार पर भी पृथक किया जा सकता है।
भाषा विज्ञानियों ने जनजातीय भाषाओं को मुख्यतः तीन भाषा परिवारों में रखा है। द्रविड़, आस्ट्रो-एशियाई और चीनी तिब्बती।
भारत में इन भाषाओं में सन्थाली बोलने वालों की संख्या सर्वाधिक जबकि गोण्डी दूसरी अधिक बोली जाने वाली भाषा है।
मध्यप्रदेश में जनजातियों की भाषाई स्थिति
मध्य प्रदेश में 43 अनुसूचित जनजातियाँ व उनके समूह हैं, जिनकी भाषा भी अलग हुआ करती थी।
अब केवल भीली, भिलाली, बारेली, पटलिया, गोण्डी, ओझियानी, अगरिया, बैगानी, कोरकू, मवासी, नहाली ही कुछ क्षेत्र में परिवर्तित रूपों के साथ सम्बन्धित समुदायों में ही पुरानी बोली अभी चलन में हैं।
अन्य जनजातियों की बोलिया लुप्त हो चुकी हैं जैसे - कोल की कोलिहारी, परधान की परधानी, भारिया की भरियाटी आदि।
मध्यप्रदेश के दक्षिण-पूर्वी तथा पश्चिम भाग में सर्वाधिक जनजाति पाई जाती हैं यहाँ पर विभिन्न प्रकार की जनजातीय बोलियाँ बोली जाती हैं जो निम्नलिखित हैं।
कोरकू (कोरकू आदिवासी द्वारा)
- आस्ट्रो-एशियाई भाषा परिवार की मुण्डा शाखा की बोली।
- मुख्यतः बैतूल, होशंगाबाद, छिंदवाड़ा व खरगोन जिलें में बोली जाती हैं।
भीली (भील जनजाति द्वारा)
- आर्य परिवार की बोली।
- रतलाम, झाबुआ, खरगोन व अलीराजपुर की भील जनजाति बोलती है।
- राजस्थानी, निमाड़ी व गुजराती प्रभाव।
गोण्डी
- गोण्डी भाषा मुख्यतः कोइतोर भाषा।
- मुख्यतः छिंदवाड़ा, सिवनी, बालाघाट, मण्डला, डिंडोरी, खण्डवा में।
- सर्वप्रथम पारी कुमार लिंगो द्वारा यह भाषा विस्तारित।
- सर्वाधिक समृद्ध साहित्य जनजातियों में गोण्डी का ही है।
- 1957 में भावसिंह मसराम (बालाघाट जिले के) ने गोण्डी बोली को गोण्डी लिपि में प्रकाशित किया।
मवासी
- छिंदवाड़ा जिले के मवासी जनजाति की बोली मवासी है।
- मोहगांव, सौसर एवं बिछुआ आदि क्षेत्र में आंशिक रूप से प्रचलित।
बंजारी
- बंजारा जनजाति की बोली जिसपे राजस्थानी प्रभाव भी है।
- ग्वालियर जिले के हुकमगढ़, पार, सिमरिया, दूबाह, डबरा, चीनौर एवं मुरार व भिण्ड जिले के गोहद खण्ड में प्रचलित।
- बंजारे अपनी बोली को 'ग्वारी' कहते हैं इसमें अनेक लोकगीत मिलते है।
बारेला
- भील की उपजाति बारेला जनजाति की मुख्य बोली।
- अलीराजपुर, पश्चिमी निमाड़ व खरगौन में भी प्रचलित।
नहाल
- बैतूल जिले के नहाल आदिवासियों की बोली।
- अत्यन्त पिछड़ी बोली तथा इस पर हिन्दी व मराठी का प्रभाव।
- बैतूल तहसील, आमला व मुल्ताई तहसील में प्रचलित।
सहरियायी
- सहरिया जनजाति की बोली।
- जान्दोमाटी, हिन्दी, ब्रज, बुन्देली व पंचमहली भाषा का स्पष्ट प्रभाव श्योपुर, अशोकनगर, ग्वालियर, भिण्ड, मुरैना, दतिया, गुना व शिवपुरी।
बैगानी
- प्रमुख रूप से डिण्डोरी, मण्डला, बालाघाट, शहडोल व अनूपपुर के साथ छत्तीसगढ़ के सीमावर्ती क्षेत्रों में प्रचलित।
भरियाटी
- पातालकोट की भारिया जनजाति द्वारा बोली जाती है।
जनजातियों की प्रमुख बोलियाँ
निमाड़ी
- इसका विकास शौरसैनी अपभ्रंश से हुआ है यह पश्चिमी हिंदी की बोली है।
- प्रमुख क्षेत्र - धार, इंदौर, देवास, बड़वानी, खण्डवा, खरगौन व झाबुआ।
- बारेला और भीली निमाड़ी की उपबोली है।
- जार्ज ग्रियर्सन ने निमाड़ी को दक्षिणी हिन्दी कह कर संबोधित किया।
- डा. श्रीराम परिहार ने निमाड़ी साहित्य का इतिहास लिखा व राम नारायण उपाध्याय ने निमाड़ी शब्द कोष का संकलन किया।
- मालवी की उपबोली निमाड़ी में सर्वाधिक रियो, कियो आदि क्रियाओं का प्रयोग होता है।
- राज्य में निमाड़ी दिवस 19 सितम्बर को मनाया जाता है।
बुन्देलखण्डी
- इसका जन्म शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है जो प्राचीन काल में शूरसेन महाजनपद में बोली जाती थी।
- दतिया, गुना, अशोकनगर, टीकमगढ़, छतरपुर, दमोह, पन्ना, शिवपुरी, भिण्ड, ग्वालियर आदि में इस भाषा का प्रचलन।
- इस बोली पर गौंडवानी, हिंदी और बैसवारी भाषा का प्रभाव है।
- ब्रजभाषा, खड़ी बोली व अवधी का सम्मिश्रण भी।
- बुंदेली उपबोलियाँ - पँवारी, लोधाती, बनाफरी एवं खटोला।
- बुंदेली कवि - फाग कवि ईसुरी, पं. जगनिक, आचार्य केशवदास।
- कवि महेश कटारे सुगम को वर्ष 2017 में बुंदेली शब्दकोश का संकलन करने के कारण साहित्य अकादमी से सम्मानित किया गया।
मालवी
- मुख्य रूप से नीमच, रतलाम, उज्जैन, देवास, इंदौर, मंदसौर।
- उपबोलियाँ - हाड़ौती, सौंधवाड़ी, रतलामी, रजवाड़ी, उमठवाड़ी व भोयरी
- महत्वपूर्ण साहित्यकार - श्री निवास जोशी, चन्द्रशेखर दुबे, ललिता रावल, डा. पूरन सहगल
- मालवी का मूल संस्कृत माना गया है इस पर अरबी, फारसी व अंग्रेजी का भी प्रभाव
- डा. धीरेन्द्र वर्मा ने मालवी को दक्षिणी राजस्थानी कहा तथा डा. कृष्ण लाल हंस के अनुसार ध्वनि और रूप की दृष्टि से मालवी पश्चिमी हिन्दी है।
ब्रजभाषा
- जन्म - शौरसैनी अपभ्रंश से।
- पश्चिमी हिन्दी की प्रधान बोली।
- प्रमुख क्षेत्र - भिण्ड, मुरैना, ग्वालियर।
- उपबोलियाँ - तौरधारी, लौध धारी सिकरवारी।
- प्रमुख रचनाकार - रहीम, सूरदास, मीराबाई एवं रसखान।
- राम शरण गौड़ को ब्रजभाषा शब्दकोश का संकलनकर्ता माना जाता है।
- हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में सबसे ज्यादा इस भाषा का प्रयोग।
बघेलखण्डी/बघेली
- इसका जन्म अर्धमागधी से हुआ।
- मुख्य क्षेत्र - रीवा, सतना, सीधी, शहडोल व उमरिया।
- इसमें 'वा' शब्द का अत्यधिक उच्चारण किया जाता है।
- संकलनकर्ता - डा. श्री निवास शुक्ल।
- प्रमुख साहित्यकार - महराज विश्वनाथ सिंह, विश्वनाथ प्रकाश।
- यह पूर्वी हिन्दी का ही रूप है।

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