जनजातियों की विशिष्ट परम्पराएँ
भारत के मध्य भाग में अवस्थित मध्य प्रदेश को देश का हृदय स्थल कहा जाता है।
मध्य प्रदेश के अधिकांश जनजाति समुदाय प्रायः वनों के निकट निवास करते हैं, इनकी अपनी भाषा, संस्कृति व सामाजिक संगठन है।
मध्यप्रदेश में अनुसूचित जनजातियों की जनसंख्या राज्य की कुल जनसंख्या का लगभग 21% है। इस प्रकार देश का एक ऐसा राज्य, जहाँ हर पाँचवा व्यक्ति अनुसूचित जनजाति वर्ग का है।
भील, गोण्ड, बैगा, कोरकू, भारिया, कोल और सहरिया आदि यहाँ की मुख्य जनजातियाँ हैं।
- जनजातियाँ वह मानव समुदाय हैं जो एक अलग निश्चित भू-भाग में निवास करती हैं तथा इनकी अलग संस्कृति रीति रिवाज व भाषा होती है।
- ये जनजातियां केवल अपने ही समुदाय में विवाह करती है।
- जनजातीय समुदायों को जनजाति, आदिम जाति, आदिवासी, वन जनजाति पिछड़ी जाति और वनवासी आदि नामों से संबोधित किया जाता है।
- इन जनजातियों का अपना एक वंशज, पूर्वज तथा सामान्य देवी-देवता होते हैं। ये मुख्यतः प्रकृति पूजक होते है।
- इनकी अपनी विशिष्ट संस्कृति तथा उससे सम्बन्धित धार्मिक व सामाजिक परम्पराएँ होती हैं।
विवाह परम्पराएँ
मध्य प्रदेश की जनजातियाँ अपने विशिष्ट एवं विभिन्न प्रकार के रीति-रिवाजों को आधुनिक समय में भी जीवित रखे हुए है।
प्रमुख विवाह
एकल विवाह, बहुपत्नी, विधवा विवाह, पुनर्विवाह अनेक प्रकार के होते हैं, उनमें से मुख्य विवाह परम्पराओं का वर्णन निम्नलिखित है-
भगेली विवाह प्रथा
यह विवाह लड़के-लड़की की रजामन्दी से होता है।
इस जनजाति में पठौनी विवाह, चढ़ विवाह तथा लमसेना विवाह प्रथाएँ भी प्रचलित हैं।
यह तीनों प्रथाएँ मण्डवातरी विवाह कहलाती हैं।
लमसेना विवाह
इसका अर्थ होता है - घर जमाई
इसमें विवाह से पूर्व ही लड़का अपनी ससुराल में रहने लगता है
इस प्रकार के विवाह की प्रथा कंवर जनजाति में पाई जाती है जिसे 'घरजन विवाह' कहते हैं।
बिंझवार जनजाति में यह प्रथा 'घरजिया' कहलाती है।
अपहरण विवाह
मध्यप्रदेश की सबसे बड़ी जनजाति भील में यह सर्वाधिक प्रचलित इसमें युवक, युवती अपनी पसन्द से विवाह करते हैं।
सेवा विवाह प्रथा
यह प्रथा बैगा तथा गोण्ड जनजाति में प्रचलित है।
लमझना विवाह प्रथा
लमझना का अर्थ भी घर जमाई होता है।
यह प्रथा कोरकू एवं बसोड़ जनजातियों में पाई जाती है।
राजी - बाजी प्रथा
परजा जनजाति में पाई जाने वाली इस विवाह प्रथा में लड़के - लड़की का अपनी पसन्द से विवाह होता है।
इस विवाह को पैठू विवाह कहते हैं।
उधरिया विवाह
बैगा जनजाति में यह पुनर्विवाह की पद्धति है।
पैठुल विवाह
बैगा जनजाति के इस विवाह में युवती की पसन्द से विवाह किया जाता है
चोर विवाह
चोर विवाह का प्रचलन बैगा जनजाति में अधिक है।
पठौनी विवाह
इस विवाह में लड़की द्वारा बारात लाई जाती है।
यह बैगा जनजाति की एक अनोखी पद्धति है।
गुरावर प्रथा
यह प्रथा बिंझवार जनजाति में प्रचलित है।
इस प्रथा में दो व्यक्ति अपनी बहनों का विवाह एक दूसरे से कर देते हैं।
दूध लौटावा विवाह
गोण्ड जनजाति में प्रचलित ममेरे, फुफेरे, लड़के - लड़कियों के विवाह की प्रथा।
उजरी मांदी
यह प्रथा बैगा जनजाति में प्रचलित है।
इस प्रथा में विधवा स्त्री का विवाह उसके देवर से कर दिया जाता है।
अंत्येष्टि एवं मृतक संस्कार
बैगा जनजाति
- शव को दफनाने व जलाने की प्रथा
- मरने वाले के अंतिम साँस के समय मुह में दही एवं सोने व चांदी का सिक्का डालते हैं जिससे अगला जन्म वैभवशाली हो। इसे सामरा प्रथा कहते हैं।
- सहरिया जनजाति → इस जनजाति में हिन्दुओं की तरह अंत्येष्टि संस्कार प्रचलित
- गोण्ड जनजाति → सामान्यतयः हिन्दू प्रथाओं की तरह दाह संस्कार
धार्मिक परम्पराएँ एवं विश्वास
विभिन्न देवी देवताओं की पूजा-आराधना सभी जनजातियाँ अपने तरीके से करती हैं जैसे- मध्य प्रदेश की गोण्ड जनजाति बहुदेववादी है तथा इनकी धार्मिक क्रियाएँ ओझा या बैगा कराता है।
इन समुदायों में प्रमुख रूप से बड़ा देव की पूजा होती है।
भील जनजाति अम्बाजी, चामुण्डा देवी, हनुमान, पीपल व तुलसी की पूजा करते हैं। पूर्वजों की पूजा धर्म का मुख्य अंग है ये लोग देवी-देवताओं को शराब व बलि चढ़ाते हैं।
कोरकू जनजाति
- काली माता, गंगा माता, महादेव व हनुमान के प्रति श्रद्धा ये अपनी उत्पत्ति महादेव की इच्छा से मानते हैं।
- इस जनजाति में गांव के बाहर हनुमान की प्रतिमा स्थापित होती है।
भारिया जनजाति
भूमिया देव की पूजा।
इनके धार्मिक कार्य भूमका कराता है।
मध्य प्रदेश में जनजातियों के धार्मिक विश्वास से संबंधित कुछ मान्यताएँ निम्न हैं-
- प्रकृतिवाद : प्राकृतिक अवयव जैसे- नदी, वन, वृक्ष तथा पर्वत आदि के साथ-साथ प्राकृतिक शक्तियों की पूजा, सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी, नदी व वर्षा को देवता मानकर पूजा।
- आत्मावाद : जनजातियों में विश्वास है कि सुख व दुख प्रदान करने में आत्मा की प्रमुख भूमिका होती है इसी मान्यता से ये लोग इनकी पूजा करते हैं।
इसी मान्यता से इन लोगों में पितरों की आत्मा पर विश्वास बढ़ा जो आगे चलकर धर्म रूप में परिवर्तित हो गया।
जनजातियों की टोटमी अवधारणा
जनजातीय धर्म में टोटम का विशेष महत्व।
विदेशी समाजशास्त्रियों ने इसे जीववाद कहा है जिनका सम्बन्ध पौधों एवं पशुओं से है।
टोटम ऐसे पदार्थ, पशु या पौधे होते हैं जो एक विशेष समूह में उसके प्रति श्रद्धा तथा भावात्मक सम्बन्ध उत्पन्न करते हैं।
जनजातियों में टोटम के तीन वर्ग है-
- वैयक्तिक टोटम
- लिंग टोटम
- सम्पूर्ण गोत्र या जाति
मध्य प्रदेश में टोटमी गोत्र
- इन जनजातियों के गोत्र पूर्वजों के नाम से आरम्भ।
- टोटमी गोत्र में पशु, पक्षी, वनस्पति इत्यादि को भी पूर्वज माना जाता है।
- भीलों के 100 से अधिक गोत्र टोटमी है इनमें से कुछ पशुओं व वनस्पतियों के नाम पर जैसे- जमनिया (जामुन का वृक्ष), अवलिया (आँवले का वृक्ष)
- गोण्डों के चार समूह हैं जो अलग-अलग टोटमी गोत्र से हैं, गोण्डों की उपजातियों में भी टोटमी गोत्र मिलते हैं
- मध्य प्रदेश की सभी जनजातियों में टोटमी गोत्र नहीं पाया जाता है।
जनजातीय बहुदेववाद तथा प्रकृति पूजा
- जनजातियों का पराशक्ति में विशेष विश्वास
- गोण्ड पशुओ, वृक्षों व पत्थरों में पराशक्ति का निवास मानती हैं।
- चित्रों के माध्यम से देवताओं की चित्रण परम्परा भी शामिल।
- भीलों में पिथौरा चित्रण के घोड़े व अन्य देवताओं का चित्रण।
- अनुष्ठान के लिए मिट्टी से पशु मूर्ति का निर्माण।
- ये मूर्तियां देवताओं को प्रसन्न करने के लिए बनाते हैं।
नरबलि
19वीं शताब्दी तक जनजातियों में इसे सामाजिक परम्परा का रूप दिया जाता था इसे देवताओं को प्रसन्न करने की प्रवृत्ति का अंग मानते थे।
शुभ - अशुभ विचार
- इसे लेकर जनजातियों में अनेक मान्यताएँ हैं।
- गोण्ड जनजाति रात्रि में मुर्गे का बोलना अशुभ मानती है वहीं कंवर जनजाति बिल्ली या सर्प द्वारा रास्ता काटने को अशुभ मानती है।
- सोते समय बैगा अपने पैर पश्चिम व दक्षिण में रखते हैं अन्य दिशाओं में पैर करना अशुभ मानते हैं।
जनजातीय धार्मिक परंपराएँ
- जनजातियों में धार्मिक परंपराओं के पालन को महत्व दिया जाता है इनमें देवताओं की मूर्तियों तथा देव स्थान पर अर्पण संबंधी पंरम्पराएँ हैं
- वनों में किसी वृक्ष के नीचे बाघडूमा (बाघ की मूर्ति) बनाया जाता है।
- मातृदेवी के मन्दिर को गुड़ी कहा जाता है इसमें लाल व सफेद ध्वज लगाते हैं।
- भील जनजाति ढाबा बनाकर कोक देवता को अर्पित करते हैं ढाबा कुम्हार बनाते हैं।
- अनुष्ठानों में काष्ठ स्तम्भों की पूजा का प्रचलन। काष्ठ स्तम्भ पूजा का वर्णन महाभारत में भी है।
जादू-टोना
- जनजातीय समाज में जादू-टोना व तंत्र-मंत्र धर्म के अंग के रूप में समाहित।
- पुरोहित व ओझा द्वारा जादुई क्रियाओं का सम्पादन।
- अर्द्धदैविक शक्तियों पर अटूट विश्वास, गुप्त रूप से इनकी पूजा करते हैं व इन्हे मनोकामना पूर्ण करने वाली पूजा मानते हैं।

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