कोरकू जनजाति की सामाजिक संरचना | korku janjati ki samajik sanrachna

कोरकू जनजाति की सामाजिक संरचना

  • परिवार
  • उपजातियां
  • निवास
  • खान-पान
  • वस्त्र व आभूषण
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परिवार

कोरकू जनजाति पितृवंशी होते है इस जनजाति में एकल व संयुक्त दोनो परिवार प्रणाली प्रचलित है।
कोरकू जनजाति में अतिथि सत्कार उच्च कोटि का होता है ये अतिथि को सर झुकाकर प्रणाम करते हैं जिसे 'जोहार जोय' कहा जाता है।

उपजाति

  • कोरकू जनजाति में चार समूह रूमा, पोतड़िया, दुलारया और बोवई या बोन्डई पाए जाते हैं।
  • मध्य प्रदेश में कोरकू जनजाति के दो वर्ग राज कोरकू एवं पोथरिया कोरकू है
  • राजकोरकू भूस्वामी व उच्च सामाजिक वर्ग के थे जबकि शेष लोग पोथरिया वर्ग के थे।
कोरकू जनजाति को चार भागों में विभाजित किया गया है-
  • बावरिया : बैतूल जिले के भैंसदेही के आदिवासी कोरकू बावरिया कहलाते हैं
  • रूमा : अमरावती महाराष्ट्र के आदिवासी कोरकू 'रूमा' कहलाते हैं।
  • बंदोरिया : पचमढ़ी और चमौली क्षेत्र के रहने वाले कोरकू बंदोरिया कहलाते है।
  • पोतड़िया : पश्चिमी मध्य प्रदेश में रहने वाले कोरकू पोतड़िया कहलाते हैं।
  • गोत्र : कोरकू जनजाति में कुल 36 गोत्र हैं। गोत्रों के नाम पशु पक्षी, दिवस, घास, मिट्टी आदि के नाम पर होते हैं।
  • कोरकू जनजाति में गोत्र चिन्ह 'मोर' को माना जाता है।

सामाजिक संगठन

कोरकू समाज में जातीय पंचायत होती है पंचायत में कोरकू समाज के पांच प्रतिष्ठित व्यक्ति पटेल, माजन, चौधरी, घेट्या व मुकरी होते हैं।
इस जनजाति के सामाजिक संगठन के तीन रूप हैं-
  1. पड़ियार - पूज्य और अति विशिष्ट व्यक्ति
  2. भोमका - कोरकू जन जाति का पुरोहित
  3. पटेल - समाज का गणमान्य व्यक्ति
जातीय पंचायत के पांच प्रतिष्ठित व्यक्ति इस प्रकार हैं-
  • पटेल → पंचायत का फैसला पटेल ही पंचों के निर्णय से सुनता है।
  • माजन → पटेल के बाद माजन का स्थान है यह पटेल के निर्णय को समझाता है।
  • चौधरी → पंचायत करने की सूचना देने का काम
  • घेट्या → प्रसाद बांटने का कार्य
  • मुकरी → मुख्य कार्य त्यौहार पर नाचने वालों को बुलाना

निवास/आवास

  • कोरकू अपना गांव किसी सुन्दर स्थान पर बनाते हैं तथा गांव के चारों ओर बांस की बाड़ लगाते हैं।
  • इनके घर आमने - सामने पंक्ति बद्ध होते हैं एवं एक दूसरे के काफी निकट होते हैं । इनके घर बाँस, खपरैल घास व लकड़ी के बने होते हैं।
  • कोरकू के निवास स्थान को ढाना कहते हैं।
  • कोरकू जनजाति अपना मूल निवास स्थान भंवरगढ़ तथा साँवलीगढ़ (बैतूल) को मानते हैं।

खान-पान/भोजन

  • कोरकू शाकाहारी व मांसाहारी दोनो होते हैं।
  • मोटे अनाज व सब्जियाँ इनका प्रमुख भोजन है
  • महुआ से बनी शराब को सीडू कहते हैं।
खान-पान के आधार पर कोरकूओं के चार गण निर्धारित हैं-
  • कोरो (आदमी) - ताजा व शुद्ध माँस खाने वाला
  • राक्षस (शैतान) - सड़े गले व मरे हुए पशु पक्षियों का माँस खाने वाला
  • सराकु (बंदर) - भाजी पाला खाने वाला
  • बाना (रीछा) - मधुमक्खी का छत्ता तोड़ने वाला

वस्त्र एवं आभूषण

  • पुरुष -> सूती बंडी, कुर्ता और धोती
  • महिला -> रंग बिरंगी धोती
कोरकू स्त्रियाँ चांदी, पीतल, कांसा आदि धातुओं के आभूषण एवं मोतियों की माला पहनती हैं।
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Kartik Budholiya

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मध्य प्रदेश की ऐतिहासिक विरासत, भूगोल, कला-संस्कृति और सामान्य ज्ञान के विशेषज्ञ Kartik Budholiya छात्रों को MPPSC, MPESB (Vyapam), MP Police, Patwari, Forest Guard और अन्य राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दिलाने के लिए निरंतर शोध-परक कंटेंट साझा करते हैं।