परिचय
लोक साहित्य की सम्पदा को निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है।
- लोक गीत जिसमें लोकगीत और लोक गाथाएँ दोनों सम्मिलित होती हैं।
- लोक गाथा
- लोक कथा
- लोकोक्ति, जिसमें पहेलियाँ और कहावतें सम्मिलित हैं।
लोकगीत
- लोकगीत संवेदनशील मानव के अन्तःकरण की अभिव्यक्ति है।
- देवेन्द्र सत्यार्थी के अनुसार 'लोकगीत किसी संस्कृति के मुँह बोलते चित्र हैं।'
- वृन्दावन लाल वर्मा के अनुसार, 'साधारण जनमानस प्रकृति की हरियाली, लताओं, कलियों, फूलों, पतझड़, श्रृंगार और करुणा के अधिक निकट रहा। पक्षी, अपने भीतर की किसी गुदगुदी या पुकार को सुनकर जिस प्रकार से चहकने लगते हैं, लगभग उसी प्रकार जनमानस के भीतर से लोकगीत उभरते हैं, झरते हैं।
- बसन्त निर्गुण के अनुसार, 'लोक गीत लोक कंठ की धरोहर हैं। एक कंठ से दूसरे कंठ, एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचने वाले लोकगीत शब्द और स्वर के दोहराव से संचरित होते हैं'।
लोक गाथा
डॉ. सत्यव्रत सिन्हा कहते हैं- लोकगाथा एक सामाजिक संस्था है, जिसकी अन्तरात्मा में व्यक्ति बैठा हुआ है। उस व्यक्ति की अवहेलना हम कदापि नहीं कर सकते। लोक गाथा गद्य-पद्य युक्त प्रबन्धात्मक कथा है, जो किसी व्यक्ति अथवा घटना पर केन्द्रित होती है।
लोक कथा
- लोक कथा वह है, जो लोक द्वारा लोक के लिए लोक से कही जाती है। लोक कथा लोक मुख में रहती है और इसके लिए वक्ता और श्रोता दोनों ही अनिवार्य होते हैं।
- एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका के अनुसार प्रचलित कहानियों को प्रमुख तीन भागों में विभाजित किया है-
- धर्मगाथा (Myths), लोक गाथा (Legend), लोक कथा (Folk tales)।
लोकोक्ति
- अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन में अपने पूर्व ज्ञान के अनुभवों को कम से कम शब्दों और सार्थक शैली में अनुकूल अवसर आने पर प्रकट करता है। यही सरल, सुबोध, जीवन
- उपयोगी उक्तियाँ लोकोक्ति साहित्य कहलाती हैं। लोकोक्ति साहित्य की परम्परा अत्यन्त प्राचीन हैं।
- लोक साहित्य की समस्त विधाएँ लोकोक्ति से ही समृद्ध हुई हैं लोक गीत लोक कथा, लोक गाथाओं में लोकोक्तियों की समृद्ध परम्परा मौजूद है।
- हिन्दी साहित्य कोश में लोकोक्ति साहित्य को दो भागों में बाँटा गया है- कहावतें और पहेली।
मध्य प्रदेश में लोक साहित्य का विवरण
बुन्देलखण्ड
लोकगीत
- लोकगीतों में विविधता
- उत्सव तथा त्योहारों और संस्कारों के दौरान गाए जाने वाले लोकगीत
- जन्म, मुण्डन, विवाह, विदाई इत्यादि अवसरों पर गायन
- ऋतुओं, बारहमासा से सम्बन्धित लोकगीत-कजरी, दादरा, हरदौल, कार्तिक गीत, सावन गीत, फाग
- खेल गीत-नौरता, टेसु, मामुलिया खेलते समय
- निर्गुण लोक भजन-विभिन्न देवी-देवताओं के गीत
- कबीर, रैदास, भरथरी का प्रभाव
- ढोलक, मृदंग, झांझ, मंजीरा, करताल इत्यादि वाद्ययन्त्रों का प्रयोग
लोकगाथा
- लोक अंचल की गाथाएँ- आल्हा खण्ड, राछरे, पंवारे तथा अन्य पौराणिक गायन
- ढोला-मारू गाथा, प्रवीण राय की गाथा, मर्दन सिंह की गाथा लक्ष्मीबाई से लेकर भगतसिंह तक की गाथा का गायन
- युद्ध तथा प्रेम व्यवहार की लोकगाथा
- श्रवण कुमार की गाथा (सरवन की गाथा), पितृभक्ति का सन्देश
लोककथा
- दोहा और काव्य-पंक्तियों के रूप में संवाद
- शिक्षा सम्बन्धी कथाएँ, दादी-नानी की कहानियाँ बाल-मनोविज्ञान की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण
- रीति-रिवाज, संस्कार, मूल्यों, लोक विश्वास से जुड़ी कथाएँ,
- हरतालिका तीज की कथा, भैयादूज की कथा, संकटा माता की कथा, गणेश चतुर्थी की कथा, सोमवती अमावस्या, तुलसी विवाह इत्यादि लोक कथाएँ प्रचलित
- देवशयनी एकादशी, अवसान देवी की कथा, दशा माता कथा, सहागलों की कथा लोकप्रिय
लोक साहित्य
- ब्रज की सांस्कृतिक चेतना का प्रभाव
- लोक साहित्य में लोकगीत, लोक भजन, आध्यात्मिक रचनाओं को महत्त्व
- बुन्देली भाषा में रचित (पश्चिमी हिन्दी की बोली)
- लोक साहित्य पर लोकगाथा का प्रभाव
- उत्तर प्रदेश के झाँसी, जालौन, हमीरपुर, तथा मध्य प्रदेश के टीकमगढ़, छतरपुर, सागर इत्यादि जिलों में प्रचलित लोकगाथा तथा लोकगीत (लोक साहित्य के रूप में प्रसिद्ध)
लोकोक्ति
- समृद्ध लोकोक्ति साहित्य
- जनजीवन में व्याप्त सुख-दुःख की मनोस्थिति को समझने में सक्षम (मनोभावों का बैरोमीटर)
- राग-द्वेष, प्रेम-अहंकार, हर्ष-विषाद, मान-अपमान इत्यादि की अभिव्यक्ति
- स्वाभिमान को व्यक्त करने वाली लोकोक्तियाँ भी प्रचलित
उदाहरण
- सड़ जाये कुटुम ने खाए/कुटुम के खाये भसम हो जाए।
- लोभी को धन लावरो खावा
- गुड़ खाने गुलगुले से परहेज
- मन भावे मूड़ हिलावे
बघेलखण्ड
लोकगीत
- सामाजिक लोकोचारों की सुन्दर प्रस्तुति-सोहर गीत, मुण्डन गीत, विवाह के दौरान माटी माँगर गीत, मँडवा के गीत, न्योताने के गीत
- जन्म, मुण्डन, यज्ञोपवीत संस्कार, विवाह इत्यादि पर लोकगीत का गायन
- विवाह के विभिन्न कार्यक्रमों पर लोकगीत गायन की प्रवृत्ति - कोहबर, जेवनार, परछन के गीत
- भजन की परम्परा लोकगीत के रूप में, सगुण भजनों के साथ सन्तों के लोक भजन प्रचलित
- ऋतुओं तथा जातीय गीत
लोकगाथा
- श्रवण कुमार मोरध्वज, गोपचन्द्र, भरथरी इत्यादि की गाथा का गायन
- राजा भरथरी तथा रानी पिंगला की गाथा का गायन
- लोरकी अहीर जाति की लोकगाथा
- पारम्परिक लोकगाथाओं का प्रचलन
- आल्हा-ऊदल सर्वाधिक प्रचलित लोकगाथा
लोककथा
- लोककथा का स्वरूप अत्यन्त प्राचीन है
- पशुओं की कथा, परी कथा, धार्मिक कथाएँ, पौराणिक कथाएँ प्रचलित
- लोककथा में मनुष्य, पशु-पक्षी, देवी-देवता, भूत-प्रेत इत्यादि पात्र के रूप में चित्रित
- बघेली लोक कथाएँ सुखान्त होती हैं।
- समाज के प्रत्येक वर्ग का चित्रण
लोक साहित्य
- अवध के सांस्कृतिक चेतना से प्रभावित साहित्य
- आध्यात्मिक भावनाओं का चित्रण
- बघेलखण्ड की सांस्कृतिक परम्परा का चित्रण
- जन सामान्य की प्रवृत्तियों की विशेष अभिव्यक्ति
- सामाजिक लोकाचार तथा कलात्मक अभिरुचि
- लोकगीत तथा लोककथा के रूप में प्रचलित
लोकोक्ति
- लोकोक्ति तथा कहावत से प्रदेश की संस्कृति का ज्ञान
- जनता की निष्ठा एवं मानसिक उर्वरता का परिचय
- जन-जन की प्रवृत्ति कहावतों (लोकोक्तियों) में सरलता के साथ चित्रित हुई है।
उदाहरण
- जेकर खाई तेकर गाई
- कमाय का हसर-हसर, नापै का पसर-पसर
- सेमी के तरकारी मैभा महतारी
प्रकृति सम्बन्धी, नीति सम्बन्धी, पशु-पक्षी सम्बन्धी, पुष्प सम्बन्धी, जाति सम्बन्धी इत्यादि प्रचलित
मालवा
लोकगीत
- वीर रस तथा पुरुषत्व प्रभाव का अभाव
- उदार मनोवृत्ति तथा नैतिक आदर्शों की छाप
- मालवा गीतों पर राजस्थानी संस्कार तथा गुजराती मान्यता का प्रभाव
- बच्चों के जन्म, विवाह आयोजनों पर लोकगीत का गायन
- मानव मन की कोमल भावनाओं का सूक्ष्म वर्णन
- मांगलिक स्नान गीत, खलियल बनोला- घोड़ी पर बैठने के समय गाया जाने वाला गीत
लोकगाथा
- मालवा में लोकगाथा का अक्षय भण्डार
- ढोला-मारवाड़, तेजा-धोल्या, ग्यारस माता, रानी रूपमति, गोपी चन्द्र की गाथाएँ
- भरथरी की गाथा, सोरठी कुँवरी की गाथा प्रचलित
लोककथा
- मालवी लोक कथाएँ मनोरंजन का सरल साधन हैं।
- प्रेम, शिक्षा, मनोरंजन, पशु-पक्षी, व्रत-त्योहार, कृषि इत्यादि से जुड़ी लोक कथाएँ
- ऐतिहासिक पात्रों-राजा विक्रमादित्य, राजा भरथरी तथा रानी पिंगला की लोक कथाएँ प्रचलित
- दशा रानी की कथाएँ एवं कलगी तुरा की दन्त कथाएँ प्रचलित
लोक साहित्य
- मालवा, मध्य प्रदेश का हृदय है।
- लोक साहित्य समृद्ध है, जो लोक संस्कृति पर आधारित है।
- लोक जीवन को लोक साहित्य में दर्शाया गया है।
- सांस्कृतिक सम्पन्नता का प्रभाव लोक साहित्य पर
- लोक भजनों की रचना- नाथपंथी, कबीर रैदास इत्यादि।
लोकोक्ति
- मालवी लोकोक्तियों को 'ओखणा' कहते हैं।
- मालवी लोकोक्तियों में लोक मानस के संस्कारों की सूक्ष्मता
उदाहरण
- ऊँट बैल को जोतणो (बेमेल जोड़ी)
- राम दे तो रामलाल नी खावा दे (किसी का अधिकार छीनना)
- मरी गाय को गोबरज सई (थोड़े लाभ से सन्तुष्ट होना)
निमाड़
लोकगीत
- निमाड़ में मंगल उत्सवों के दौरान लोकगीत का गायन (गणगौर के गीत)
- गणेश पूजन, बधाई गीत, कूकड़ा गीत इत्यादि प्रचलित (सिंगाजी के भजन)
- संध्या के समय 'सांजुली' गीत सामूहिक रूप से, देवी-देवताओं के भजन
- स्मृति गीत (विवाह के समय), मण्डप गीत, विदा गीत मायरा गीत, निमाड़ी भात गीत इत्यादि प्रचालित
- श्रावण, कार्तिक, फागुन इत्यादि महीनों में ऋतु गीत, बारहमासा का गायन
- श्रम गीत (कृषि कार्य के दौरान)
लोकगाथा
- लोकगाथाएँ - ढोला-मारू गाथा, काजल रानी गाथा, भीलटदेव गाथा
- लोकगाथाओं के लिए प्रसिद्ध
- पौराणिक आख्यानों पर आधारित
- सुभद्रा विवाह, श्रवण कुमार की गाथा
- ऐतिहासिक पात्रों की गाथा-अहिल्या गाथा, यशवन्त राव होल्कर की गाथा, राजा चैनसिंह रांगड़ा की गाथा
लोककथा
- लोककथा को 'लोकवार्ता' भी कहते हैं।
- मनोरंजन से अधिक उचित सन्देश
- लोक कथाओं में पाप-पुण्य से लेकर स्वर्ग-नरक तक की विषय-वस्तु
- धार्मिक कथाएँ, पशु-पक्षी सम्बन्धी कथाएँ, साधु-फकीरों की कथाएँ, ऐतिहासिक कथाएँ
- ऋषि पंचमी, भोला का भगवान, जादू की अंगूठी इत्यादि शीर्षक वाली लोक कथाएँ
लोक साहित्य
- लोक साहित्य पर लोक संस्कृति को प्रभाव
- लोक जीवन में संस्कृति की अभिव्यक्ति
- लोकगीत तथा लोक कथाओं की रचना
- निमाड़ के लोक भजन-सगुण गीतों से अधिक निर्गुण गीतों का प्रचलन
- कबीरा निर्गुण भक्ति लोक साहित्य का अभिन्न रूप
लोकोक्ति
- लोकोक्तियाँ लोक जीवन की सम्पदा
- लोक जीवन की कमियों तथा उपलब्धियों का प्रमाण है
उदाहरण
- देनों न, मंडो लडानों
- करी लियो सो काम, लियो सो राम
- एक तवा की रोटी, काई छोटी काई मोटी
- दया को मूल धर्म, पाप को मूल भरम।
- एक बेटी माथा ठोकी
मध्य प्रदेश की जनजातियों की भाषाएँ एवं बोलियाँ
भीली भाषा
- राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र तथा मध्य प्रदेश (रतलाम, धार, झाबुआ, खरगौन एवं अलीराजपुर) में रहने वाली भील जनजाति द्वारा बोली जाने वाली भाषा।
- यह देवनागरी लिपि में लिखी जाती है।
- यह भाषा कथा, गल्प, गीत, पहेलियों, मुहावरों आदि के लिए प्रसिद्ध है।
गोंडी भाषा
- दक्षिण - केंद्रीय द्रविड़ समूह की भाषा।
- सिवनी, छिंदवाड़ा, मंडला, बालाघाट, डिंडौरी, अनूपपुर, उमरिया एवं शहडोल जिलों में रहने वाली गोंड जनजाति द्वारा बोली जाने वाली भाषा।
- गोंडी, देवनागरी एवं तेलुगु लिपि में लिखी जाने वाली तथा विवाह गीत, मुहावरों व कहावतों के लिए प्रसिद्ध भाषा।
कोरकू भाषा
- ऑस्ट्रो - एशियाई भाषा परिवार की मुण्डा शाखा की एक भाषा।
- मध्य प्रदेश के होशंगाबाद, बैतूल, छिंदवाड़ा, खरगौन जिलों की कोरकू जनजाति द्वारा बोली जाने वाली भाषा।
- यह देवनागरी लिपि की बालबोध शैली में लिखी जाती है।
कुरुख भाषा
- द्रविड़ परिवार से संबंधित भाषा। अन्य नाम - उराँव भाषा।
- सीधी, सिंगरौली, शहडोल तथा अनूपपुर जिलों में निवासरत उराँव जनजाति द्वारा बोली जाने वाली भाषा।
- यह देवनागरी एवं तोलोंग सीकी लिपि में लिखी जाती है।
- उप भाषा - उराँव, किसान एवं धांगड़।
मवासी भाषा
- मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले की जुन्नारदेव तहसील में रहने वाली मवासी जनजाति द्वारा बोली जाने वाली भाषा।
राज्य के लोक साहित्यकार
जगनिक
- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार इनका जन्म संवत 1230 ई. में हुआ। जगनिक कालिंजर नरेश परिमल देव के शासनकाल में दरबारी कवि व योद्धा था।
- रासो व आल्हारखण्ड की रचना की, यह ओजमयी शैली में है
- यह विश्व की सबसे बड़ी लोकगाथा है। इसमें आल्हा एवं ऊदल की वीरगाथा है इसका प्रस्तुतीकरण बनाफरी बोली में गीत द्वारा किया गया है।
सन्त सिंगाजी
- जन्म - 1574 ई. ग्राम खजूरी (बड़वानी)
- सन्त कबीर के समकालीन थे, ये सखियाँ गाते थे।
- रचनाएँ - निमाड़ी बोली में बारहमासी, सातवार, पन्द्रह तिथि दोषबोध, नरद, शरद
ईसुरी
- जन्म - 1898 मे झाँसी जिले के मऊरानीपुर में
- इनकी सबसे बड़ी देन फाग विद्या का अविष्कार था।
- बुन्देलखण्ड का जयदेव भी कहा जाता है।
- कृष्णानंद गुप्त ने ईसुरी की फागे, गौरीशंकर त्रिवेदी ने ईसुरी प्रकाश व लोकेन्द्र सिंह नागर ने ईसुरी सतसई में ईसुरी साहित्य का संकलन किया।
- इनकी एक अन्य रचना रजेऊ है।
घाघ दुबे
- जन्म - 1753 कन्नौज के निकट
- कविता, ज्योतिष एवं नीति सम्बन्धी ज्ञानी थे
जनजातीय साहित्य
मध्य प्रदेश में जनजातीय संस्कृति रीति-रिवाज परम्पराओं आदि को प्रसिद्धि दिलाने व जन-जन तक पहुंचाने के लिए विभिन्न विद्वानों द्वारा विभिन्न साहित्यों की रचना की गई जो निम्नलिखित है।
| पुस्तक | लेखक |
|---|---|
| • ट्राइबल इकोनामी : अ स्टडी आफ बैगा | डी. एस नाम |
| • द बैगा | वैरियर एल्विन |
| • द कोल ट्राइब्स आफ सेण्ट्रल इण्डिया | ग्रिफिथ वाल्टर जी |
| • कोरकू जनजाति | डा. हरिप्रसाद जोगी |
| • मध्य प्रदेश के गोण्ड राज्य | डा. सुरेश मिश्र |
| • मध्य प्रदेश की जनजातियाँ समाज व व्यवस्था | डा. शिवकुमार तिवारी |
| • भील जन जीवन व संस्कृति | डा. अशोक डी पाटिल |
| • द भील्स अ स्टडी | टी. बी. नायक |
| • द मुरिया एंड देयर घोटुल | वैरियर एल्विन |

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