मध्यप्रदेश की जनजातियों का स्वतन्त्रता आन्दोलन में योगदान

मध्य प्रदेश की जनजातियों का स्वतन्त्रता आन्दोलन में योगदान

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भारतीय स्वतन्त्रता संघर्ष में जनजातियों की भूमिका

भारत की सांस्कृतिक स्वाभिमान व स्वायत्ता में जनजातियों का बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहा है। भारत में प्रत्येक विदेशी आक्रमणकारी के विरुद्ध जनजातियों ने सबसे पहले शस्त्र उठाए हैं।
अपनी मिट्टी के प्रति समर्पित इन जनजातियों के संघर्ष को आगे चलकर समूचे राष्ट्र ने स्वीकार किया। इसलिए अंग्रेजो ने जनजातियों का दमन करने के लिए दो काम किए। पहला शिक्षा व सेवा के नाम पर
परिवर्तन का अभियान चलाया और दूसरा कुछ जनजाति समूहों को अपराधी घोषित किया
उत्तर में विंध्याचल से लेकर दक्षिण पश्चिम में सहयाद्रि के पश्चिमी घाट तक भीलों का निवास स्थान था। अंग्रेजी राज के दमन व शोषण के चलते शान्तिपूर्ण भील शस्त्र उठाने पर विवश हुए व अंग्रेजो के लिए
आतंक बन गए।
1817 ई. में खानदेश के भीलों का विद्रोह हुआ अंग्रेजो ने इस विद्रोह के पीछे पेशवा के मन्त्री त्रियम्बक के होने की बात कही।

बम्बई प्रेसीडेन्सी के एलफिंस्टन ने लिखा है-
"त्रियम्बक और उनके भतीजे गोण्डा जी दंगल और महीपा दंगल खानदेश के विद्रोही नेता है"

मध्य प्रदेश में स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान हुए प्रमुख विद्रोह

भील विद्रोह

  • 1818 ई. में खानदेश पर अंग्रेजो का कब्जा होते ही भीलों ने पराधीनता को सिरे से नकार दिया और संघर्ष शुरु कर दिया अंग्रेजों ने क्रूरता से भील क्रान्ति का दमन किया।
  • 1819 ई. में भीलों ने पुनः क्रान्ति की, पहाड़ी क्षेत्र की विभिन्न चौकियों पर कब्जा कर लिया भीलों ने अंग्रेजो की स्थिति दयनीय कर दी।
  • भील नायक दशरथ ने 1820 ई. में मोर्चा सम्भाला तो हिरिया नायक के नेतृत्व में भीलों ने 1822 ई. में अंग्रेजी राज को चुनौती दी।
  • 1823 में कर्नल रॉबिन्सन बड़ी सेना लेकर भीलों के क्षेत्र में दाखिल हुए उन्होने दो वर्षों तक भीलों का कत्ल किया उनकी बस्तियों में आग लगा दी पर वे भीलों के हौसलों को नही तोड़ पाए।
  • 1824 ई. में त्रियम्बक के भतीजे गोण्डा जी दंगालिया ने भीलों को एकत्र कर विप्लव किया वही 1826 में दांग सरदारों और लौहारा के भीलों ने अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा संभाला।
  • 1827 में कर्नल आउद्रम ने भील सेना की स्थापना भील क्रान्ति को दबाने के लिए किया।
  • धार राज्य के भीलों ने 1831 ई. में संघर्ष शुरू किया तो 1846 में मालवा के भीलों ने मोर्चा संभाला।
  • 1857 की क्रान्ति की असफलता के बाद इन क्रान्तिकारियों ने वनों में शरण ली।
  • 22 अगस्त 1859 को मण्डलेश्वर दुर्ग जेल में क्रान्तिकारियों ने विद्रोह कर द्वार तोड़ दिया व भाग निकले।
  • 1857 में तात्या टोपे छिंदवाड़ा पहुँचे थे, रावखेड़ा के जमींदार महावीरा सिंह ने उन्हे शरण दी थी।
  • 21 जनवरी 1939 को डोंगरगढ़ के निकट बदरा टोला में सत्याग्रही आदिवासियों की भीड़ पर गोली चलाई गई जिसमें रामाधीन गोण्ड शहीद हो गए।

बुन्देला विद्रोह

  • वर्ष 1820 में नर्मदा-सागर क्षेत्र का गठन किया गया नागपुर के तात्कालिक शासक अप्पाजी भोसले से अंग्रेजों को प्राप्त हुआ था।
  • विद्रोह का प्रमुख कारण 1833-34 में गठित मार्टिन बर्ड समिति द्वारा भूमि कर की दर में बढ़ोत्तरी थी।
  • यहाँ पर 1835 ई. में 20 वर्षीय बन्दोबस्ती व्यवस्था लागू की गई।
  • मालगुजारी व जमीदारों के अधिकारों में कमी की गई।
  • विद्रोह का प्रारम्भ जैतपुर के राजा पारीछत द्वारा बुन्देलखण्ड क्षेत्र में बुढ़वा मंगल (काशी के समान) के आयोजन का न होने देना।
  • प्रमुख विद्रोही - मधुकर शाह, गणेशजू, जवाहर सिंह बुन्देला, विक्रमजीत (गुढ़ा के ठाकुर) बखत सिंह (चिरगांव), पारीछत (जैतपुर के राजा) और ढिल्लनशाह आदि थे।

मध्य प्रदेश में 1857 का विद्रोह

  • 1857 की क्रान्ति के दिनों में सम्पूर्ण मालवा और निमाड़ में क्रान्तिकारियों का जाल फैला था खरगौन और उसके आसपास का क्षेत्र प्रमुख केन्द्र था।
  • 3 जून 1857 को नीमच छावनी में पैदल व घुड़सवार सैनिकों ने विद्रोह किया तथा छावनी में आग लगा दी।
  • 18 जून 1857 को महाकौशल में विद्रोह प्रारम्भ हुआ। सागर में शेख रमजान व गढ़ा मण्डला के शंकरशाह तथा उनके पुत्र ने 20 जून 1857 को शिवपुरी में विद्रोह का नेतृत्व किया।
  • राघवगढ़ के राजा ठाकुर प्रसाद, मण्डला के श्री बहादुर और देवी सिंह तथा रायपुर के जमींदार नारायण सिंह ने अपने-अपने क्षेत्र से इस विद्रोह का नेतृत्व किया।

मण्डला में विद्रोह

  • मण्डला जिले में रामगढ़ रियासत के राजा की मृत्यु के पश्चात अंग्रेजों ने हड़प नीति लागू की तथा ब्रिटिश तहसीलदार की नियुक्ति की इसका रानी अवन्तिबाई ने इसका विरोध किया।
  • अवन्तिबाई ने मण्डला के निकट खेड़ी गांव में ब्रिटिश सेनापति वार्डिंगटन को युद्ध में पराजित किया तथा तहसीलदार की हत्या कर दी।
  • दिसम्बर 1857 में सेनापति वार्डिंगटन ने रीवा राज्य के सैनिक की सहायता ली तथा गढ़ा मण्डला पर आक्रमण करके किले को घेर लिया।
  • 20 मई 1858 को अवन्तीबाई ने अपनी अंगरक्षिका गिरधारीबाई के साथ कटार से आत्महत्या कर ली इन्हें रामगढ़ की झाँसी की रानी के नाम से भी जाना जाता है।

अन्य क्षेत्रों में विद्रोह

1857 के विद्रोह के दौरान बानापुर और शाहगढ़ के राजाओं ने भी विद्रोह किया था। मण्डलेश्वर, सेंधवा व बड़मानी में भीमा नायक के नेतृत्व में आदिवासी विद्रोह हुआ।
1859 में पुनः मण्डलेश्वर पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया तथा विद्रोहियों को सामूहिक रूप से फांसी दे दी गई।
क्रान्तिकारियों के आपसी सांमजस्य का अभाव व अंग्रेजों की सफल नीति के कारण यह आन्दोलन असफल रहा।

भीमा नायक जनजातीय विद्रोह

  • स्वाधीनता संघर्ष और जनजातीय चेतना का एक भील नायक
  • मध्य प्रदेश के निमाड़ क्षेत्र के इस नायक ने 1840 से 1864 ई. तक अंग्रेजों के विरुद्ध भीलों की क्रान्ति का नेतृत्व किया।
  • तात्या टोपे से प्रेरित व उन्हें नर्मदा पार कराने वाले इस नायक ने निमाड़ में अंग्रेजों को कड़ी टक्कर दी।
  • भीमा की माँ सुरसी ने एक क्रान्तिकारी टोली का नेतृत्व किया, इनको अंग्रेजो ने कैद करके भीषण यातनाएँ दी जिससे जेल में ही इनकी मृत्यु हो गई।
  • इसके प्रतिशोध में जुलाई 1857 में खरगौन क्षेत्र में, अक्टूबर 1857 में ब्रहानगाँव में, मण्डलेश्वर, महेश्वर, राजपुर व खरसन गांव में तीव्र हमले हुए।
  • भीमा की सीधी गिरफ्तारी संभव नहीं थी तो उसे षडयन्त्र के माध्यम से 2 अप्रैल 1858 को घने जंगलो में सोते हुए कैद कर लिया।

सेंधवा विद्रोह

  • खाज्या नायक (निमाड़ के) सेंधवा घाट के निवासी थे उन्होने अंग्रेजी राज को नकारते हुए अंग्रेजों की नौकरी छोड़ दी तथा भीलों के स्वतंत्रता संग्राम की कमान संभाली।
  • इनकी क्रान्तिकारी गतिविधियों में भीलों के अतरिक्त मकरानी व अरब योद्धा भी शामिल थे।
  • 20 जनवरी 1858 को लैफ्टिनेंट एटकिन्स तथा लैफ्टिनेण्ट पोरबिन ने इसके दल पर हमला कर दिया जिसमें खाज्या नायक की पराजय हुई।
  • खाज्या ने 1857 के युद्ध विराम के बाद भी संघर्ष जारी रखा इसी श्रृंखला में 1 जुलाई 1860 में अंग्रेजों से प्रत्यक्ष युद्ध हुआ।
  • इस युद्ध में खाज्या के 1500 क्रान्तिकारी शहीद हुए 150 क्रान्तिकारियों को पेड़ से बाँधकर गोली मार दी गई जिस कारण शेष साथियों को पलायन करना पड़ा।
  • खाज्या नायक को पकड़ने में असमर्थ रहने पर अंग्रेजों ने साजिश के तहत रोहिद्दीन नामक मकरानी जमींदार को शामिल किया।
  • 3 अक्टूबर 1860 को स्नान उपरान्त सूर्य उपासना करते समय गद्दार रोहिद्दीन ने पीछे से गोली चला दी।

निमाड़ विद्रोह

  • सीताराम कँवर और रघुनाथ सिंह मण्डलोई भिलाला जनजाति के नायक थे इन्होने 1857 ई. में अंग्रेजों के विरुद्ध आवाज उठाई।
  • इन क्रान्ति नायकों ने 3000 क्रान्तिकारियों का संगठित दल बनाया जो खरगौन की ओर बढ़ते हुए 30 सितम्बर 1858 को वालसमुन्द चौकी पर अधिकार कर लिया तथा जामुनी चौकी को लूट लिया।
  • मौरियों का विद्रोह 1863 ई. में हुआ था इससे पूर्व 1859 ई. में बस्तर के जमींदारों ने विद्रोह किया था।
  • 1923 में छिंदवाड़ा के तामिया तहसील में सभा का आयोजन किया जिसमें बादल भोई के नेतृत्व में आदिवासियों ने हिस्सा लिया।
  • 8 अक्टूबर 1858 को मुठभेड़ में सीताराम कँवर शहीद हो गए जिसके बाद भिलाला नायक रघुनाथ सिंह मण्डलोई ने कमान संभाली।

शंकर शाह रघुनाथ शाह का विद्रोह

गोण्डवाना के गोण्ड राजवंश के प्रतापी राजा शंकर शाह व उनके पुत्र रघुनाथ शाह ने 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम मे जबलपुर क्षेत्र का नेतृत्व किया
उनकी युद्ध की योजना षड्यन्त्र के माध्यम से पहले ही पता चल गई फलस्वरूप पिता-पुत्र को मृत्युदण्ड दे दिया गया।

गोण्ड जनजातीय आन्दोलन

गोण्ड जमीदारों चैन सिंह तथा राजबाशाह ने अंग्रेजों के विरुद्ध मराठा का सहयोग किया फलस्वरूप उन्हें विष देकर मार दिया गया।
जंगल सत्याग्रह में गोण्डो का नेतृत्व बैतूल में विष्णु सिंह तथा कोरकू क्रान्तिकारी नेता गंजन सिंह कोरकू ने किया।

टुरिया सत्याग्रह

इसमें 9 अक्टूबर 1930 को चन्दन बगीचा में घास काटकर सत्याग्रह आरम्भ किया जाना तय हुआ।
इस सत्याग्रह की सम्पूर्ण कार्रवाई का विवरण घनश्याम सक्सेना ने अपनी पुस्तक जंगल सत्य व जंगल सत्याग्रह में किया है।

राष्ट्रीय आन्दोलन से संबंधित प्रमुख घटनाएँ

जंगल सत्याग्रह
  • आदिवासियों द्वारा जंगल के संरक्षण के लिए सर्वप्रथम यह सत्याग्रह बंजारीटाल में हुआ यह महात्मा गाँधी के नमक सत्याग्रह से प्रेरित था।
  • 19 अगस्त 1942 में घोड़ा, डोंगरी, शाहपुर (बैतूल) में एक और जंगल सत्याग्रह की शुरुआत हुई इसका नेतृत्व बीरसा गोण्ड व जिर्रा गोण्ड ने किया।

नमक सत्याग्रह
  • शुरुआत 6 अप्रैल 1930 को जबलपुर से।
  • अन्य स्थान खण्डवा, कटनी, दमोह, मण्डला, सीहोर रायपुर आदि नगरों में नमक बनाकर कानून तोड़ा गया।
  • खुले अधिवेशन में नागरिक स्वतन्त्रता की मांग सम्बन्धी प्रस्ताव प्रस्तुत।

भारत छोड़ो आन्दोलन
  • इसका प्रारम्भ ग्वालियर रियासत के विदिशा से हुआ यह आन्दोलन मराठी युवकों ने अंग्रेजों के विरुद्ध सक्रिय विरोध प्रदर्शन के रूप में किया।
  • क्रान्तिकारियों ने गाँधी जी के करो या मरो से प्रेरित होकर यह कार्य किया।
  • 12 अगस्त 1942 में पट्टन बाजार (बैतूल) में पुलिस की वर्दी उतरवाकर उन्हें खादी वस्त्र पहना दिए गए।
  • आंदोलन के नेतृत्वकर्ता महादेव तेली था जो शहीद हो गया। इन्हें रीवा का शेर कहा जाता था।

स्वतंत्रता आन्दोलन के महान जनजातीय व्यक्तित्व/नायक

शंकर शाह
  • गढ़ मण्डला के पूर्व शासक व संग्राम शाह के वंशज।
  • युद्ध कला के साथ काव्य रचना में भी सिद्धहस्त।
  • 18 सितम्बर 1857 को जबलपुर में वीरगति।

झलकारी देवी
  • जन्म 22 नवम्बर 1830 विवाह- तोपची पूरन सिंह से।
  • लक्ष्मीबाई की सेना में महत्वपूर्ण भूमिका।
  • 5 अप्रैल 1858 को मृत्यु।

रघुनाथ शाह
  • शंकर शाह के पुत्र।
  • जबलपुर स्थित ब्रिटिश सेना को युद्ध के लिए प्रेरित किया।
  • 18 सितम्बर 1857 को पिता के साथ वीरगति को प्राप्त।

खाज्या नायक
  • 1856 ई० में कम्पनी के विरुद्ध युद्ध छेड़ा।
  • बड़ी सेना एकत्र की व 1857 की क्रान्ति में भाग लिया।
  • 1860 ई० में धोखे से हत्या।

रघुनाथ सिंह मण्डलोई
  • भील व भिलाला समुदाय के प्रतिष्ठित नेतृत्वकर्ता।
  • इनके प्रभाव से निमाड़ क्षेत्र में विद्रोह।

मुड्डे बाई
  • मध्य प्रदेश में जंगल कानून भंग करने के सिलसिले की तरह जंगल सत्याग्रह के दौरान ब्रिटिश शासन के दमन के चलते 9 अक्टूबर 1930 को शहीद हो गईं।

मंशू ओझा
  • 1942 में ऐतिहासिक भारत छोड़ो आन्दोलन में बैतूल के मंशू ओझा ने अनेक क्रान्तिकारी घटनाओं को अंजाम दिया।
  • 1942 में गिरफ्तारी व कठोर यातनाएँ।
  • 28 अगस्त 1981 को बैतूल जिले में निधन।

राजा ठाकुर प्रसाद
  • राघवगढ़ के शासक।
  • अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध में भाग लेने के लिए आजीवन कारावास।

श्री बहादुर सिंह
  • मण्डला में विद्रोह करने के कारण फाँसी की सजा।
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Kartik Budholiya

Kartik Budholiya

मध्य प्रदेश की ऐतिहासिक विरासत, भूगोल, कला-संस्कृति और सामान्य ज्ञान के विशेषज्ञ Kartik Budholiya छात्रों को MPPSC, MPESB (Vyapam), MP Police, Patwari, Forest Guard और अन्य राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दिलाने के लिए निरंतर शोध-परक कंटेंट साझा करते हैं।