प्राचीन इतिहास के स्रोत | prachin itihas ke srot

प्राचीन इतिहास के स्रोत

  1. पुरातात्विक स्रोत
  2. साहित्यिक स्रोत
  3. विदेशी यात्री विवरण

1. पुरातात्विक स्रोत
  • अभिलेख
  • स्मारक/भवन
  • मुद्राएँ/सिक्के
  • मूर्तियाँ
  • चित्रकला

2. साहित्यिक स्रोत

धार्मिक साहित्य
  • ब्राह्मण साहित्य (वेद, वेदांग, उपनिषद, अरण्यक, पुराण, स्मृति, महाकाव्य, ब्राह्मण ग्रन्थ, सूत्र साहित्य)
  • ब्राह्मणोत्तर साहित्य (बौद्ध ग्रन्थ, जैन ग्रन्थ)

लौकिक साहित्य
  • ऐतिहासिक ग्रन्थ
  • जीवनी ग्रन्थ
  • गल्प साहित्य ग्रन्थ

3. विदेशी यात्री विवरण
  • यूनानी रोमन लेखक: टीसियस (ईरान), हेरोडोटस (इतिहास का पिता), निर्याकस, आनेसिक्रिटस, अरिस्टोबुलस, मेगस्थनीज (इण्डिका के लेखक), डाइमेकस (बिन्दुसार), डायनोसियस (अशोक), टालमी (ज्योग्राफी के लेखक)
  • चीनी लेखक: फाह्यान, सुंगयुन, ह्वेनसांग, इत्सिंग
  • अरबी लेखक: सुलेमान, अलमसूदी, अलबरूनी, इब्नबतूता
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पुरातात्विक स्रोत

  • इसके अन्तर्गत मुख्यतः अभिलेख, स्मारक, भवन, मूर्तियाँ तथा चित्रकला शामिल हैं।
  • इनका अध्ययन करने वाला 'पुरातत्वविद' कहलाता है।
इसका वर्णन निम्न है-

अभिलेख

अभिलेखों अथवा उत्कीर्ण वस्तुओं के अध्ययन को पुरालेखशास्त्र (Epigraphy) और प्राचीन शिलालेखों के अध्ययन को पुरालिपि शास्त्र (Paleography) कहा जाता है।
सबसे प्राचीन अभिलेखीय साक्ष्य हड़प्पा सभ्यता स्थलों से प्राप्त मुहरों से प्राप्त हुआ है।
सर्वप्रथम 1837 ई. में जेम्स प्रिंसेप (ईस्ट इण्डिया कम्पनी के एक अधिकारी) ने अशोक के अभिलेखों को पढ़ा।
एशिया माइनर के बोगजकोई नामक स्थल से प्राप्त अभिलेखों से आर्यों के भारत आगमन की जानकारी मिलती है।

प्राचीन भारत के प्रमुख अभिलेख/स्तम्भलेख

अभिलेख शासक विवरण
हाथीगुम्फा कलिंग नरेश खारवेल • खारवेल के शासन संबंधी घटना का विवरण
जूनागढ़ गिरनार रुद्रदामन • रुद्रदामन के व्यक्तित्व, कार्य व विजयों का उल्लेख
नासिक अभिलेख गौतमी बलश्री • इसमें गौतमी पुत्र शातकर्णी की उपलब्धियाँ
प्रयाग प्रशस्ति समुद्रगुप्त • समुद्रगुप्त की विजय व नीतियों का वर्णन
भितरी स्तम्भ स्कन्दगुप्त • स्कन्दगुप्त की जीवन घटनाओं का विवरण
एरण अभिलेख भानुगुप्त • इसमें सती प्रथा का प्रथम उल्लेख
ऐहोल अभिलेख पुलकेशिन द्वितीय • पुलकेशिन द्वितीय व हर्षवर्धन के बीच युद्ध का वर्णन
मन्दसौर अभिलेख यशोधर्मन-विष्णुवर्धन • यशोधर्मन की सैनिक उपलब्धियों का वर्णन
देवपाड़ा अभिलेख विजयसेन • बंगाल के सेन वंशीय शासक का उल्लेख
ग्वालियर अभिलेख प्रतिहार शासक मिहिरभोज • मिहिरभोज की उपलब्धियों का वर्णन
गरुड़ स्तम्भ लेख हेलियोडोरस • द्वितीय सदी ई.पू. मध्य भारत में भागवत धर्म विकसित होने का प्रमाण मिलता है।
बांसखेड़ा और मधुवन अभिलेख हर्षवर्धन • इसमें हर्षवर्धन की उपलब्धियों का उल्लेख मिलता है।
बालाघाट एवं कार्ले अभिलेख सातवाहन शासक • सातवाहन शासकों की उपलब्धियों का वर्णन
अयोध्या अभिलेख धनदेव • इसमें सर्वप्रथम अश्वमेध यज्ञ की जानकारी मिलती है।

अभिलेखों में प्रयुक्त लिपियां

  • ब्राह्मी लिपि (बाएँ से दाएँ)
  • खरोष्ठी लिपि (दाएँ से बाएँ)
  • ग्रीक एवं अरमाइक लिपि - ग्रीक - बाएँ से दाएँ, अरमाइक - दाएँ से बाएँ

स्मारक एवं भवन

  • देशी स्मारक जैसे हड़प्पा व मोहनजोदड़ो के साथ-साथ विदेशों में कम्बोडिया मंदिर, जावा में बोरो बुदूर स्तूप (महायान सम्प्रदाय) से स्मारक मिले
  • मंदिर व उनके अवशेषों से भी वास्तुकला के पर्याप्त विकास की जानकारी मिलती है।

सिक्के

सिक्कों के अध्ययन को मुद्राशास्त्र (Numismatics) कहा जाता है जेम्स प्रिंसेप को मुद्राशास्त्र का जनक माना जाता है।
प्राचीन उपमहाद्वीप से प्राप्त सर्वाधिक प्राचीन सिक्के आहत सिक्के थे जिन पर पेड़, मछली व सांड की आकृतियाँ बनी थी इन पर बाद में तिथियाँ व देवी-देवताओं के नाम भी अंकित किए गए।
  • पहली बार स्वर्ण सिक्के हिंद-यूनानी शासकों ने जारी किए
  • सर्वाधिक स्वर्ण सिक्के जारी किए - गुप्त शासकों ने
  • सर्वाधिक शुद्ध स्वर्ण सिक्के कुषाण शासकों ने जारी किए।
  • सीसे के सिक्के सातवाहन शासकों ने जारी किए
  • सर्वप्रथम चांदी के सिक्के गुप्त शासक चन्द्रगुप्त द्वितीय ने जारी किए।

मूर्तिकला

हड़प्पा सभ्यता से प्राप्त कांसे की नृत्य मूर्ति का प्राचीनतम उदाहरण है।
कलात्मक प्रगति की जानकारी हड़प्पा काल के लाल मृदभांड और उत्तरवैदिक काल के चित्रित धूसर मृदभांड से मिलती है।
गांधार कला (विदेशी प्रभाव) और मथुरा कला (पूर्णतः स्वदेशी) मूर्तिकला की दो शैलियाँ हैं।

चित्रकला

प्राक-ऐतिहासिक गुफाओं विशेषकर भीमबेटका (म.प्र.) से पूर्व ऐतिहासिक काल की सांस्कृतिक विविधता पर प्रकाश पड़ता है।
अजन्ता व बाघ के उन्नत गुफा चित्रों से गुप्तकाल की उन्नत सांस्कृतिक दशा का पता चलता है।
अजन्ता का बोधिसत्व पद्मपाणि चित्र सर्वाधिक प्रसिद्ध है।

साहित्यिक स्रोत

धार्मिक साहित्य

ब्राह्मण साहित्य
वेद उपवेद विशेषतथ्य
ऋग्वेद आयुर्वेद चिकित्सा शास्त्र से संबंधित
यजुर्वेद धनुर्वेद युद्ध कला से संबंधित
सामवेद गन्धर्व वेद कला, नृत्य, संगीत से संबंधित
अथर्व वेद शिल्प वेद वास्तुकला । भवन निर्माण से संबंधित

ब्राह्मण ग्रन्थ
वेद एवं ब्राह्मण ग्रन्थ
वेद ब्राह्मण ग्रन्थ
ऋग्वेद ऐतरेय एवं कौषीतकी ब्राह्मण
यजुर्वेद शतपथ एवं तैत्तिरीय ब्राह्मण
सामवेद पंचविश एवं षडविश ब्राह्मण
अथर्ववेद गोपथ ब्राह्मण

उपनिषद्
  • सबसे बड़ा उपनिषद - बृहदारण्यक
  • सबसे छोटा उपनिषद - मुण्डकोपनिषद
वेद संबंधित उपनिषद
ऋग्वेद ऐतरेयोपनिषद
यजुर्वेद बृहदारण्यकोपनिषद
i शुक्ल यजुर्वेद ईषोपनिषद
ii कृष्ण यजुर्वेद कठोपनिषद मैत्रायणी
सामवेद छान्दोग्योपनिषद, कठोपनिषद
अथर्ववेद प्रश्नोपनिषद, मुण्डकोपनिषद, माण्डूक्योपनिषद

सूत्र साहित्य

  • वैदिक साहित्य को अक्षुण्ण बनाए रखने हेतु इसकी रचना।
  • इसमें मनुष्य के कर्तव्यों, कर्मकाण्डों, राजनीति, यज्ञीय विधि-विधानों वर्णाश्रम व्यवस्था व सामाजिक नियमों का उल्लेख है।

स्मृतियाँ
  • मनुष्य के सम्पूर्ण जीवनकाल प्रवृत्तियों व क्रियाकलापों की जानकारी
  • सबसे प्राचीन स्मृतियाँ मनुस्मृति व याज्ञवल्क्य स्मृति है।

महाकाव्य
  • रामायण
  • महाभारत

पुराण
  • पुराने आख्यानों से युक्त ग्रन्थ
  • कुल संख्या - 18

ब्राह्मणेत्तर साहित्य

बौद्ध साहित्य
• प्राचीनतम बौद्ध ग्रन्थ पालि भाषा में लिखे गए इनमें सर्वप्रमुख त्रिपिटक हैं-
सुत्तपिटक - धार्मिक सिद्धांत
विनयपिटक - नियम
अभिधम्म पिटक - दार्शनिक सिद्धांत
• जातक कथाएँ - बुद्ध के पूर्व जन्मों के कथानक वृतान्त
जैन साहित्य
जैन साहित्य को आगम (सिद्धांत) कहा जाता है
इनकी रचना प्राकृत (अर्द्ध-मागधी) भाषा में की गई।
प्रमुख ग्रन्थ: परिशिष्ट पर्वन, भद्रबाहुचरित कल्पसूत्र, भगवती सूत्र, आदि पुराण
बौद्ध धर्म से संबंधित ग्रन्थ
ग्रन्थ विवरण
दीपवंश मौर्यकाल का इतिहास
महावंश मौर्य काल का इतिहास
मिलिन्दपन्हो नागसेन द्वारा रचित
दिव्यावदान अशोक के उत्तराधिकारियों का वर्णन
ललित विस्तार बुद्ध का वर्णन देवता रूप में
प्राचीन काल के ग्रन्थ रचनाकार
अष्टाध्यायी पाणिनी
इण्डिका मेगस्थनीज
महाभाष्य पतंजलि
कामसूत्र वात्स्यायन
कुमार संभवम कालिदास
मेघदूतम, रघुवंशम कालिदास
मृच्छकटिकम शूद्रक
दशकुमार चरितम दण्डी
वासवदत्ता सुबन्धु
रत्नावली हर्षवर्धन
किरातार्जुनीयम भारवि
हर्ष चरित बाणभट्ट
नागानन्द हर्ष वर्धन
प्रियदर्शिका हर्षवर्धन

प्राचीन भारत का इतिहास

स्रोतों की विविधता के आधार पर तीन वर्गों में विभाजित किया जाता है।

(i) प्रागैतिहासिक काल
(मानव उत्पत्ति से 3000 ई.पू. तक)
केवल पुरातात्विक साक्ष्य उपलब्ध

(ii) आद्य ऐतिहासिक काल
(3000 से 600 ई.पू. तक)
लिखित साक्ष्य उपलब्ध लेकिन पढ़ा नहीं जा सका

(iii) ऐतिहासिक काल
(600 ई.पू. के बाद)
पुरातात्विक व साहित्यिक दोनों का साक्ष्य उपलब्ध

पाषाण काल

1. पुरापाषाण काल (5 लाख से 10 हजार ई.पू.)
  • निम्नपुरापाषाण काल (5 लाख से 50 हजार ई.पू.)
  • मध्य पुरापाषाण काल (50 हजार से 40 हजार ई.पू.)
  • उच्च पुरापाषाण काल (40 हजार से 10 हजार ई.पू.)

2. मध्य पाषाण काल (10 हजार से 7 हजार ई.पू.)

3. नव पाषाणकाल (7 हजार ई.पू. के बाद)

भारत के पुरापाषाणकालीन स्थल

  • डीडवाना: राजस्थान में निम्न पाषाणकालीन स्थल है, जहाँ से प्राचीन मानवीय गतिविधियों की जानकारी मिलती है।
  • जोगदाहा: जोगदाहा तथा आदमगढ़ पुरापाषाणकाल के प्रारम्भिक स्थल हैं, जहाँ मनुष्य के निवास करने के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
  • रोहड़ी: पाकिस्तान के सिंध प्रान्त में स्थित पुरापाषाणिक स्थल है।
  • मिर्जापुर: इस स्थल की बेलन घाटी में विभिन्न कलाकृतियाँ तथा पशुओं की हड्डियों के अवशेष मिले हैं।
  • बुढ़ा पुष्कर: थार मरुस्थल में पुरापाषाणिक स्थल है, जहाँ से पाषाण उपकरणों की प्राप्ति हुई है।
  • सिंहभूम: इसके लोटा पहाड़ को महत्त्वपूर्ण पुरापाषाणिक स्थल माना जाता है, जहाँ से तक्षणी तथा तक्षणी उपकरण प्राप्त हुए हैं।
  • साबरमती: से विभिन्न पुरापाषाणिक उपकरणों जैसे तक्षणी, हस्तकुठार तथा छूरी को प्राप्त किया गया है।
  • मेदिनीपुर: यह स्थल पुरापाषाणकालीन स्थलों में वृहद स्थल है, यह पश्चिम बंगाल राज्य में स्थित है।
  • भीमबेटका: एक महत्त्वपूर्ण पुरापाषाणिक स्थल है, जहाँ प्राक्-ऐतिहासिक पेन्टिंग के अवशेष उपलब्ध हैं।
  • नेवासा: इस स्थल से पुरापाषाण तथा नव पाषाण के संक्रमण का स्तर प्राप्त हुआ है, जिसमें कृषि तथा शिकार की गतिविधियाँ शामिल हैं।
  • चिर्की: स्थल से हस्तकुठार, छूरी, तक्षणी जैसे उपकरण प्राप्त हुए हैं।
  • हुंसगी: इस स्थल से वृहद उपकरणों की प्राप्ति हुई, जिससे उपकरण निर्माण स्थल के होने का समर्थन होता है।
  • कर्नूल: इस स्थल से पुरापाषाण कालीन केतावरम शैल चित्र की प्राप्ति हुई है।
  • रेनिगुंटा: इस स्थल से वृहद उपकरण चाकू तथा तक्षणी की प्राप्ति हुई, जो अधिक परिनिष्ठित हैं।
  • अतिरम्पक्कम: पुरापाषाण काल में एक अवमुक्त स्थल है, इसकी खोज तथा उत्खनन 1863 ई. में हुई।
  • पल्लवरम: यह एशिया में सबसे पुराना पुरापाषाणकालीन स्थल है।
  • गुडियाम: शैल वास की खोज, जिसका उपयोग पुरापाषाणिक निवासियों द्वारा किया जाता था। यह निम्न पुरापाषाण काल के 'मद्रासियन संस्कृति' का हिस्सा है।

भारत के मध्यपाषाणकालीन स्थल

  • पचमढ़ी: प्रथम मध्यपाषाणकालीन स्थल है, जहाँ से सांस्कृतिक संस्तरणों को प्राप्त किया गया है।
  • बागोर: भारत में स्थित वृहद् मध्यपाषाण कालीन स्थल है।
  • अघनाज: यह प्रथम स्थल है, जहाँ से विभिन्न पशुओं के एक से अधिक हड्डियों के अवशेष प्राप्त हुए, विशेषकर भेड़िया तथा नेवला की हड्डियों के।
  • आदमगढ़: यहाँ से पशुपालन का पहला साक्ष्य प्राप्त हुआ।
  • चौपानी माण्डो: इस महत्त्वपूर्ण स्थल से जहाँ खाद्य संग्राहक से खाद्य उत्पादक समाज के संक्रमण को देखा जा सकता है।
  • कुचाई: प्राक्-ऐतिहासिक स्थल तथा मध्यपाषाण काल एवं नव पाषाण-काल के बीच संक्रमण को दर्शाने वाली प्रवृत्ति वाला पुरातात्विक स्थल है।
  • संगन कल्लू: खाद्य उपकरणों के निर्माण स्थल के रूप में महत्त्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है।

भारत के नवपाषाणकालीन स्थल

  • किली गुल मुहम्मद: मेहरगढ़ के बाद दूसरा सबसे प्राचीन नवपाषाण कालीन स्थल, जहाँ से 2000 ई. पू. कृषि किए जाने के साक्ष्य प्राप्त हुए।
  • मेहरगढ़: नवपाषाणकाल का एकमात्र स्थल, जहाँ से सात संस्तरणों की प्राप्ति, 7000 ई. पू. से 2000 ई. पू. के बीच के संस्तरण उपलब्ध, विश्व में कृषि का प्रथम साक्ष्य प्राप्त हुआ
  • बुर्ज़होम: नवपाषाण काल से महापाषाण संस्कृति तक के मानव बस्तियों के साक्ष्य, गर्तवास का अवशेष प्राप्त हुए।
  • गुफकराल: कश्मीर में प्राचीन गुफा का अवशेष, जो 2000 से 3000 ई. पू. के बीच का है।
  • नागपुर: 'जुनापानी' तथा 'दूगधामा' से प्रस्तर स्तम्भ के साक्ष्य प्राप्त हुए, जो नवपाषाण कालीन के हैं।
  • चिरांद: यह बिहार के सारण जिले में स्थित नवपाषाणिक स्थल है।
  • नेवासा: एकमात्र स्थल, जहाँ नवपाषाण काल तथा महापाषाणिक संस्कृति के बीच एक सूत्रता है।
  • टी. नरसिंह पुर: नवपाषाणिक स्थल जिसे 2500 ई. पू. का माना जाता है। यह कर्नाटक में स्थित सबसे बाद का नवपाषाणकालीन स्थल है।
  • ब्रह्मगिरि: वृहद् संख्या में नवपाषाण कालीन तथा महापाषाण कालीन निर्माणों के अवशेष प्राप्त हुए।
  • पिकलीहल: मनुष्य के पशुपालक होने का साक्ष्य प्राप्त हुआ।
  • नागार्जुनकोण्डा: यह प्राक् महापाषाणकालिक स्थल है, जहाँ चार मानव-कंकाल के अवशेष प्राप्त हुए, यहाँ अन्तिम संस्कार के साक्ष्य उपलब्ध हैं।
  • पैयम्पल्ली: यह नवपाषाण काल तथा महापाषाणकाल के संक्रमण को दर्शाने वाला पुरातात्विक स्थल है, जहाँ से वास स्थल तथा अन्तिम संस्कार स्थल के साक्ष्य प्राप्त हुए।
काल संस्कृति के लक्षण महत्व, उपकरण एवं विशेषताएँ
निम्न पुरापाषाण काल शल्क, गंडासा, खंडक उपकरण संस्कृति हस्तकुठार एवं वटिकाश्म उपकरण, होमोइरेक्ट अस्थि अवशेष नर्मदा से प्राप्त हुए हैं
मध्य पुरापाषाण काल फलक संस्कृति फलक, बेधनी, खुर्चनी, चित्रकारी भीमबेटका से
उच्च पुरापाषाण काल अस्थि, खुर्चनी व तक्षणी प्रारम्भिक होमोसेपियंस का काल, फलक व हड्डी के उपकरण
मध्य पाषाण काल सूक्ष्म पाषाण संस्कृति सूक्ष्म उपकरण बनाने की तकनीक का विकास, अर्द्धचंद्राकार उपकरण, इकधार फलक, पशुपालन
नव पाषाण काल पॉलिश्ड उपकरण संस्कृति प्रारम्भिक कृषि, कपड़ा बुनना, भोजन पकाना, मृद्भांड निर्माण, स्थायी निवास, पहिया, अग्नि का प्रचलन

ताम्र पाषाण काल (2000-500 ई.पू.)

  • सर्वप्रथम तांबे की धातु का प्रयोग (पत्थर के साथ-साथ)
  • राबर्ट ब्रूस फुट द्वारा 1863 में मद्रास के निकट पल्लवरम से हाथ की कुल्हाड़ी की खोज
  • मातृदेवी की पूजा (मूर्ति से)

ताम्रपाषाण काल की प्रमुख संस्कृतियाँ

संस्कृति अवधि क्षेत्र
सावलदा संस्कृति 2300 - 2000 ई. पू. महाराष्ट्र का धुलिया क्षेत्र
अहार संस्कृति 2100 - 1500 ई. पू. राजस्थान का उदयपुर क्षेत्र
कायथा संस्कृति 2100 - 1800 ई. पू. चंबल नदी का क्षेत्र
प्रभास संस्कृति 2000 - 1400 ई. पू. गुजरात का तटीय क्षेत्र
रंगपुर संस्कृति 1700 - 1400 ई. पू. गुजरात का तटीय क्षेत्र
मालवा संस्कृति 1700 - 1200 ई. पू. नर्मदा नदी का क्षेत्र
जोरवे संस्कृति 1400 - 700 ई. पू. महाराष्ट्र का दायमा व इनामगाँव
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Kartik Budholiya

Kartik Budholiya

मध्य प्रदेश की ऐतिहासिक विरासत, भूगोल, कला-संस्कृति और सामान्य ज्ञान के विशेषज्ञ Kartik Budholiya छात्रों को MPPSC, MPESB (Vyapam), MP Police, Patwari, Forest Guard और अन्य राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दिलाने के लिए निरंतर शोध-परक कंटेंट साझा करते हैं।