वैदिक काल (1500 - 600 ई. पू.)
भारत के इतिहास में वैदिक युग, कांस्य युग के अन्त और लौह युग के प्रारम्भ के बीच के समय को माना जाता है। इसको दो भागों में बाटा गया है।
- ऋग्वैदिक काल (1500 - 1000 ई. पू.)
- उत्तर वैदिक काल (1000 - 600 ई. पू.)
1. ऋग्वैदिक काल (1500 - 1000 ई. पू.)
- यह शुरुआती दौर था, जिसकी सारी जानकारी हमें सिर्फ 'ऋग्वेद' से मिलती है। इस समय आर्य मुख्य रूप से सिंधु और उसकी सहायक नदियों (सप्त-सैंधव प्रदेश, जो आज का पंजाब-हरियाणा और पाकिस्तान है) के आसपास रहते थे।
- एक खुला और सरल समाज: यह समाज बहुत ही सरल और कबीलाई था। सबसे अच्छी बात यह थी कि वर्ण व्यवस्था जन्म पर नहीं, बल्कि काम (कर्म) पर आधारित थी। यानी एक ही घर में पिता अगर पूजा करवाता है तो वह ब्राह्मण, और बेटा अगर युद्ध लड़ता है तो वह क्षत्रिय हो सकता था।
- महिलाओं का सम्मान: महिलाओं को बहुत सम्मान दिया जाता था। वे पढ़ाई करती थीं, यज्ञों में बैठती थीं और खुद अपना जीवनसाथी चुन सकती थीं। बाल-विवाह जैसी कोई कुप्रथा नहीं थी।
- काम-धंधा (गाय ही धन थी): उस समय गाय सबसे बड़ी संपत्ति मानी जाती थी। लोग मुख्य रूप से गायें चराते थे और खेती बस अपनी जरूरत भर की करते थे।
- राजनीति और धर्म: कबीले के मुखिया को 'राजा' कहते थे, लेकिन वह मनमानी नहीं कर सकता था। उस पर 'सभा' और 'समिति' जैसी लोगों की पंचायत का कंट्रोल होता था। लोग प्रकृति (हवा, बारिश, आग) की पूजा करते थे। इंद्र और अग्नि उनके सबसे बड़े देवता थे। ना कोई मंदिर था, ना मूर्ति पूजा।
2. उत्तर वैदिक काल (1000 - 600 ई. पू.)
- इस दौर में एक बहुत बड़ा बदलाव आया - लोहे की खोज। लोहे की कुल्हाड़ियों से जंगल साफ हुए और लोग गंगा-यमुना के मैदानों (उत्तर प्रदेश, बिहार) तक फैल गए।
- समाज में कड़वाहट: इस समय समाज थोड़ा कठोर हो गया। वर्ण व्यवस्था अब जन्म से तय होने लगी (यानी ब्राह्मण का बेटा ब्राह्मण ही होगा)। जातियों का सिस्टम यहीं से शुरू हुआ। दुख की बात यह रही कि महिलाओं की आज़ादी काफी कम कर दी गई।
- खेती और बड़े राज्य: लोहे के औजारों से खेती बहुत अच्छी होने लगी। अब पशुपालन पीछे छूट गया और खेती मुख्य काम बन गया। छोटे-छोटे कबीले मिलकर बड़े राज्य या 'जनपद' बन गए। राजा बहुत ताकतवर हो गया और उसका पद पुश्तैनी हो गया। सभा-समितियों की अहमियत खत्म हो गई।
- धर्म में दिखावा: इंद्र की जगह अब प्रजापति (ब्रह्मा), विष्णु और शिव प्रमुख देवता बन गए। पूजा-पाठ में दिखावा, बड़े-बड़े यज्ञ और पशु बलि बहुत बढ़ गए। हालांकि, इसी समय के आखिर में 'उपनिषद' भी लिखे गए, जिन्होंने इन कर्मकांडों का विरोध किया और सच्चे ज्ञान पर ज़ोर दिया।

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