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भारतीय ज्ञान परम्परा | Bhartiya gyan parampara

भारतीय ज्ञान परम्परा

यह लेख राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अंतर्गत भारतीय ज्ञान परंपरा के पुनरुद्धार और इसके विविध आयामों की विस्तृत जानकारी देता है। इसमें प्राचीन खगोल विज्ञान, आयुर्वेद, योग, व्याकरण और दार्शनिक सिद्धांतों के साथ-साथ उज्जैन की विश्व प्रसिद्ध वैदिक घड़ी जैसे आधुनिक नवाचारों का उल्लेख है। MPPSC के विद्यार्थियों के लिए यह सामग्री मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत और प्राचीन भारतीय विज्ञान के अंतर्संबंधों को गहराई से समझने हेतु काफी उपयोगी है।
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परिचय

भारत सरकार के उच्च शिक्षा विभाग द्वारा प्रस्तुत राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) में शिक्षा के सभी स्तरों पर भारतीय ज्ञान परम्परा के समावेश की अनुशंसा की गई है।
इसके लिए केन्द्रीय शिक्षा मन्त्रालय, भारत सरकार के अन्तर्गत 'भारतीय ज्ञान परम्परा प्रभाग (Indian Knowledge System Division) को स्थापित किया गया है।

मध्य प्रदेश सरकार द्वारा उठाए गए कदम
  • उच्च शिक्षा विभाग द्वारा 'भारतीय ज्ञान परम्परा' आधारित नीति निर्धारण एवं क्रियान्वयन।
  • एक विषय में समाहित न होकर प्रत्येक विषय में स्वतन्त्र रूप से समाहित ज्ञान परम्परा।

मुख्यतः 18 विषयों का समावेश।
  • गणित
  • इतिहास
  • भौतिक विज्ञान
  • दर्शनशास्त्र
  • हिन्दी
  • समाजशास्त्र
  • रसायनशास्त्र
  • राजनीतिशास्त्र
  • वाणिज्य
  • प्रबन्धन
  • वनस्पति विज्ञान
  • संस्कृत
  • अर्थशास्त्र
  • मनोविज्ञान
  • प्राणीशास्त्र
  • संगीत
  • अंग्रेजी
  • भूगोल

इसके अतिरिक्त आयुर्वेद, योग, शिक्षा आदि भारतीय ज्ञान परम्परा के अभिन्न अंग हैं -

आयुर्वेद

चरक द्वारा लिखित 'चरक संहिता', सुश्रुत द्वारा लिखित 'सुश्रुत संहिता' तथा वाग्भट्ट द्वारा लिखित 'अष्टांग हृदय' को 'आयुर्वेदत्रयी' भी कहा जाता है। आयुर्वेद का उद्देश्य स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना तथा रोगी के रोग को दूर करना है। आयुर्वेद प्राचीन ज्ञान परम्परा का अंग है किन्तु नवीन रोगों के उपचार में भी यह प्रभावी है। एलोपैथी तथा आयुर्वेद के समन्वय से भी कई रोगों का कारगर उपचार संभव है। कोरोना (कोविड-19) के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में आयुर्वेदिक काढ़े की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी।
आयुर्वेद के महत्वपूर्ण तथ्यों का वर्णन ऋग्वेद में उपलब्ध है। यजुर्वेद में 82 औषधियों का उल्लेख है। अथर्ववेद में आयुर्वेद को 'भेषज' या भिषग्वेद कहा गया है। अथर्ववेद में 289 औषधियों का उल्लेख है।
भारत में भारतीय ज्ञान परम्परा के अन्तर्गत आयुर्वेद को मान्यता प्रदान करने का कार्य किया गया है। वर्ष 2014 में आयुष मंत्रालय (आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध तथा होम्योपैथी) की स्थापना के साथ ही आयुर्वेद को प्रोत्साहन मिला है। वर्ष 2020 में भारत सरकार ने आयुर्वेदिक चिकित्सकों को कुछ रोगों में 'शल्य चिकित्सा' की अनुमति भी दी है।

शिक्षा

भारतीय ज्ञान परम्परा का सबसे श्रेष्ठ पहलू प्राचीन काल में स्थापित भारतीय शिक्षा के केन्द्र रहे थे। प्राचीन भारत की शिक्षा प्रणाली जागृति के लिए एक माध्यम थी।
प्राचीन वैदिक शिक्षा प्रणाली नालंदा, तक्षशिला, विक्रमशिला विश्वविद्यालयों के माध्यम से विकसित होती रही तथा कई महान विद्वानों के सृजन की गाथा की साक्षी रही है। शिक्षा को ज्ञानोन्मुख, मूल्यवान तथा रोजगार उन्मुख बनाने में इन शिक्षा केन्द्रों का अपना महत्व रहा है।

योग

योग भारतीय ज्ञान परम्परा का वह तत्व है जिसे आज सम्पूर्ण विश्व में मान्यता प्राप्त है। योग बहुआयामी शब्द है, इसे वर्तमान समय में वैश्विक मान्यता दिलाने का कार्य भारत सरकार ने भलीभाँति किया है।
प्रत्येक वर्ष 21 जून को सम्पूर्ण विश्व में अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाता है। योग शरीर और मन को जोड़ता है कहा गया है, 'युज्यते अनेन इति योगः' अर्थात जिसके द्वारा जोड़ा जाए वह योग है।
महर्षि पतंजलि ने योग का शास्त्रीय अर्थ बताते हुए लिखा है- 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः' अर्थात योग की स्थिति तब प्राप्त होती है जब मन में आने वाले सभी बदलाव रुक जाने पर योग की स्थिति प्राप्त होती है।

दार्शनिक सिद्धान्त

दार्शनिक सिद्धांत भारतीय जीवन पद्धति के मार्गदर्शक पहलू है। मौलिक सत्य को तर्कबद्धता के साथ समझाने की प्रक्रिया में दार्शनिक सिद्धान्तों ने भारतीय चेतना को प्रभावित किया है।
भारत में पहली शताब्दी ई.पू. तक 6 आस्तिक और 3 नास्तिक दर्शनों का प्रतिपादन हो चुका था। ज्ञान आधारित दर्शन की पृष्ठभूमि उपनिषद है। समस्त दर्शन वेदान्त अर्थात उपनिषदों की दार्शनिक प्रवृत्ति तथा चिन्तन से प्रभावित हैं।
  • दर्शन का शिक्षा से विशिष्ट संबंध रहा है। शिक्षक एक दार्शनिक की भाँति वांछित लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास करने के लिए शिक्षा का उपयोग करता है। शिक्षा दर्शन का क्रियाशील पक्ष है और यह उसे सक्रिय बनाता है समाजवादी तथा जन हितैषी राज्य की स्थापना के लिए शासन के शुचितापूर्ण होने तथा उत्तम नागरिकों के निर्माण ने दर्शन की पुनर्स्थापना को बल दिया है।
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खगोल

वर्तमान समय में खगोल-विज्ञान विकसित अवस्था में है भारतीय ज्ञान परम्परा में खगोल विज्ञान को महत्त्व दिया जाता रहा है, खगोल भारत की अति प्राचीन तथा उज्जवल परम्परा का हिस्सा रहा है।
आधुनिक खगोल विज्ञान की शुरूआत 1618 ई. में माना जाता है। दूरबीन की सहायता से ग्रहों-उपग्रहों की खोज की शुरूआत हुई किन्तु इसमें कई शताब्दियों पूर्व भारत में आर्यभट्ट, वराहमिहिर तथा ब्रह्मगुप्त के सिद्धांत प्रतिपादित हुए जो आज भी सटीक और प्रमाणिक हैं।
आर्यभट्ट ने माना था कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती हुई सूर्य की परिक्रमा करती है। किसी ग्रह की कक्षा का अनुमान करते हुए उसकी गति का सूत्र आर्यभट्ट ने तैयार किया था जो वर्तमान में भी सटीक और प्रमाणिक है।
ब्रह्मगुप्त की रचना 'ब्रह्मस्फुट सिद्धांत' में खगोलीय उपकरणों तथा सतत गणना को प्रतिपादित किया गया है जिसकी अवधारणा का लाभ आधुनिक सिद्धांतकारों ने भी उठाया है।
भास्कर प्रथम एक प्रसिद्ध खगोलविद तथा गणितज्ञ थे। इनका जन्म वल्लभी (गुजरात) में हुआ था। इन्हें दशमलव प्रणाली में संख्याओं को लिखने का श्रेय दिया जाता है।
भास्कर प्रथम पहले गणितज्ञ थे, जिन्होंने 'चतुर्भुज' की चर्चा की तथा इससे जुड़े सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया।
भास्कर द्वितीय ने गणित की प्रसिद्ध पुस्तक 'सिद्धान्त शिरोमणि' की रचना की, जिसमें 'लीलावती', 'बीज गणित', 'ग्रह गणित' तथा 'गोलाध्याय' नामक चार भाग हैं।
  • वराहमिहिर ने दशमलव अंकन प्रणाली का प्रयोग किया। उन्होंने अपनी रचना 'पंचसिद्धांतिका' में पांच खगोलीय विद्याओं का उल्लेख किया है। उनके सिद्धांत की प्रमाणिकता आज भी विद्यमान है।

प्राचीन एवं आधुनिक भारतीय वेधशालाएँ

प्राचीन वेधशालाएँ
  • भारतीय खगोल विज्ञान के इतिहास का साक्ष्य 'ऋग्वेद' में पाया जाता है। तारों और नक्षत्रों की गणना के लिए जिन स्थानों में उपकरणों की स्थापना की जाती थी, उसे 'वेधशाला' कहा गया। ब्रह्मगुप्त को उज्जैन (मध्य प्रदेश) में खगोलीय वेधशाला का प्रमुख नियुक्त किया गया। बाद में भास्कर प्रथम भी इस वेधशाला के प्रमुख बने।
  • सवाई जयसिंह द्वारा निर्मित पाँच वेधशालाएँ:- 1. दिल्ली (नई दिल्ली), 2. जयपुर, 3. उज्जैन, 4. मथुरा तथा 5. वाराणसी।
  • जयसिंह द्वारा निर्मित इन खगोलीय वेधशालाओं को 'जन्तर मन्तर' कहा जाता है।

प्रमुख आधुनिक वेधशालाएँ
  1. इंडियन एस्ट्रॉनॉमिक्स ऑब्जर्वेटरी, हेनले (लद्दाख)
  2. वेनू बाप्पू ऑब्जर्वेटरी, काबालूर (तमिलनाडु)
  3. उदयपुर सोलर ऑब्जर्वेटरी, उदयपुर (राजस्थान)
  4. आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जर्वेशन साइंसेस, नैनीताल (उत्तराखण्ड)
  5. जी एम आर टी ऑब्जर्वेटरी, खोदाद (महाराष्ट्र)
  6. एमपी बिडला प्लेनेटोरियम एण्ड ऑब्जर्वेटरी, कोलकाता (पश्चिम बंगाल)
  7. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफीजिक्स, बेंगलुरू (कर्नाटक)
  8. देवस्थल ऑप्टिकल टेलीस्कोप, नैनीताल (उत्तराखण्ड)
  9. गिरावली ऑब्जर्वेटरी, पुणे (महाराष्ट्र)
  10. कोडईकनाल सोलर ऑब्जर्वेटरी, कोडईकनाल (तमिलनाडु)
  11. ऊटी रेडियो टेलीस्कोप, ऊटी (तमिलनाडु)
  12. मद्रास ऑब्जर्वेटरी, चेन्नई (तमिलनाडु)
  13. गौरियाबदनूर रेडियो ऑब्जर्वेटरी, गौरियाबदनूर

विश्व की पहली वैदिक घड़ी

विश्व की पहली वैदिक घड़ी (Vedic Clock) की स्थापना उज्जैन (मध्य प्रदेश) में की गई है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 1 मार्च 2024 को इस वैदिक घड़ी का उद्घाटन किया।
वैदिक घड़ी की स्थापना जीवाजी वेधशाला के निकट जन्तर-मन्तर के भीतर किया गया है। यह घड़ी 85 फुट ऊँचे एक टावर पर लगाई गई है। इस वैदिक घड़ी के माध्यम से हिन्दू पंचांग ग्रहों की स्थिति, ज्योतिषीय गणना, भविष्यवाणियों इत्यादि को प्रदर्शित की जाएगी।
यह घड़ी भारतीय मानक समय (IST) तथा ग्रीनविच मीन टाइम (GMT) को भी बताएगी।

जैविक घड़ी (Biological watch)

जैविक घड़ी किसी सजीव की शारीरिक गतिविधियों को नियंत्रित करती है।
वर्ष 2017 में तीन अमेरिकी वैज्ञानिकों- जेफरी हॉल, माइकल रोजबाँश और माइकल यंग को संयुक्त रूप से जैविक घड़ी के संबंध में अनुसंधान के लिए नोबेल पुरस्कार दिया गया।

व्याकरण तथा ध्वनि विज्ञान

व्याकरण और ध्वनि विज्ञान वैदिक ज्ञान परम्परा से निसत हुई हैं वेदों को संहिता भी कहा जाता है यह ऋचाओं का समूह है जिसमें स्तुतियाँ संग्रहित हैं विशेष क्रम में मंत्रों का सुव्यवस्थित संग्रह व्याकरण और ध्वनि विज्ञान के लिए प्रेरणा प्रदान करते हैं।
भाषा से संबंधित नियमों के ज्ञान के लिए व्याकरण की जरूरत होती है वहीं उच्चारण की प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए ध्वनि विज्ञान को महत्व दिया जाता है। पाणिनी की अष्टाध्यायी चौथी शताब्दी ई. पू. में लिखी गई तथा व्याकरण को इस ग्रन्थ ने व्यवस्थित रूप दिया। पतंजलि के 'महाभाष्य', जयादित्य की 'कासिका वृत्ति' तथा वामन की टीकाएँ व्याकरण और ध्वनि विज्ञान को प्रभावी बनाने वाली रचनाएँ थीं, जिनका प्रयोग आगे नियमों के निर्माण में संदर्भ के लिए किया गया।

जीव विज्ञान तथा चिकित्सा

भारतीय ज्ञान परम्परा में जीव विज्ञान व चिकित्सा को अत्यधिक महत्व दिया गया है। आधुनिक युग में डिप्रेशन, तनाव, मानसिक अवसाद इत्यादि प्रवृत्तिया बढ़ती जा रही हैं, मनोवृत्ति तथा चित्तवृत्ति की स्थिरता के लिए कई महत्वपूर्ण उपाय बताएं गए हैं।

आयुष का पूरा रूप है- 'आयुर्वेद, योग तथा प्राथमिक चिकित्सा यूनानी, सिद्ध, सोवा रिग्पा तथा होम्योपैथी'
  • यह भारत में प्रचलित चिकित्सा प्रणालियाँ हैं। आयुर्वेद की भारत में एक समृद्ध विरासत है। योग और सिद्ध ऋषियों द्वारा प्रचलित की गई। यूनानी चिकित्सा प्रणाली का विकास 8वीं शताब्दी ई. में भारत में हुआ, जो पश्चिमी जैव चिकित्सा अवधारणाओं पर आधारित है।
  • सोवा रिग्पा, तिब्बती चिकित्सा प्रणाली है। यह बौद्ध शरणार्थियों के माध्यम से भारत आया। होम्योपैथी चिकित्सा का जन्म 18वीं शताब्दी में जर्मनी में हुआ था।
वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था कि हम भारतीयों के बहुत ऋणी हैं जिन्होंने हमें गिनना सिखाया जिसके बिना कोई सार्थक वैज्ञानिक खोज नहीं हो सकती थी।

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