जनजातियों से सम्बन्धित संवैधानिक प्रावधान | janjatiyo se sambandhit samvaidhanik pravdhan

जनजातियों से सम्बन्धित संवैधानिक प्रावधान

आदिवासी शब्द का प्रयोग भारत में जनजातियों का वर्णन करने के लिए किया जाता हैं। भारतीय संविधान सभी नागरिको को यह गारंटी प्रदान करता हैं कि किसी भी नागरिक के साथ भेदभाव नही किया जाएगा।
संविधान में कुछ विशिष्ट प्रावधान हैं जो अनुसूचित जनजातियों (ST) के अधिकारों व कल्याण से सम्बंधित हैं।
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सेवा सुरक्षा उपाय

अनुच्छेद 16 (4ए) - राज्यों को एससी/एसटी के लिए पदोन्नति में आरक्षण का प्रावधान करने की अनुमति देता है, यदि उन्हें राज्य के तहत सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है।
अनुच्छेद 355 - सेवाओं और पदों के लिए अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के दावे का उल्लेख।

आर्थिक अधिकार

अनुच्छेद 244 (1) - छठी अनुसूची के अन्तर्गत आने वाले असम, मेघालय, मिजोरम और त्रिपुरा के अतिरिक्त अन्य राज्यों में अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजाति क्षेत्रों के प्रशासन व नियंत्रण के लिए पांचवी अनुसूची के प्रावधानों को लागू करता है।
अनुच्छेद 275 पांचवी और छठी अनुसूची के अन्तर्गत निर्दिष्ट राज्यों (एसटी और एससी) को सहायता अनुदान का प्रावधान करता है।

सामाजिक अधिकार

अनुच्छेद 23 - बंधुआ मजदूरी को समाप्त करने से सम्बंधित है तथा मानव तस्करी और जबरन श्रम को प्रतिबंधित करता है। इस प्रावधान का उल्लंघन दण्डनीय अपराध है।
अनुच्छेद 24 - बाल श्रम को प्रतिबंधित करता है, 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को कारखाने, खदानों या खतरनाक गतिविधियों में काम करने से प्रतिबंधित करता है।

शैक्षिक एवं सांस्कृतिक अधिकार

अनुच्छेद 15 (4) - अनुसूचित जनजातियों के शैक्षिक उन्नति के लिए विशेष प्रावधानों को सुनिश्चित करता है।
अनुच्छेद 46 - राज्य को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देने और उन्हें सामाजिक अन्याय एवं सभी प्रकार के शोषण से संरक्षित करने का निर्देश देता है।
अनुच्छेद 350 - विशिष्ट भाषाओं, लिपियों या संस्कृतियों के संरक्षण के अधिकारों का प्रावधान करता है।

राजनैतिक अधिकार

अनुच्छेद 164 - झारखण्ड, उड़ीसा, मध्य प्रदेश राज्यों में अनुसूचित जनजाति के कल्याण के भारसाधक मंत्री की नियुक्ति का प्रावधान करेगा
अनुच्छेद 243 (4) - प्रत्येक पंचायत में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थान आरक्षित करेगा।
अनुच्छेद 244 (1) - असम, मेघालय त्रिपुरा और मिजोरम के राज्यों से अन्यथा किसी राज्य में अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों का प्रशासन और नियंत्रण तथा अनुसूचित जनजातियों के कल्याण और प्रगति से संबंधित ऐसे मामलों पर सलाह देने के लिए एक जनजातीय सलाहकार परिषद की स्थापना करेगा।
अनुच्छेद 330 - राज्य लोक सभा में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थानों के आरक्षण का प्रावधान करेगा।
अनुच्छेद 332 - राज्यों के विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थानों के आरक्षण का प्रावधान करेगा।

अनुसूचित जनजाति की परिभाषा

अनुसूचित जनजातियाँ पद सबसे पहले भारतीय संविधान में प्रयुक्त हुआ।
  • अनुच्छेद 366 (25) - "ऐसी आदिवासी जाति, समुदाय या उनके समूह के रूप में, जिन्हे इस संविधान के उद्देश्यों के लिए अनुच्छेद 342 में अनुसूचित जनजातियाँ माना गया है" परिभाषित किया गया है।
  • अनुच्छेद 342 - राष्ट्रपति किसी राज्य या केन्द्र शासित प्रदेश के सन्दर्भ में और राज्य के मामले में राज्यपाल से परामर्श के बाद जनजातियों या उसके समूहों को अनुसूचित जनजातियों के रूप में अधिसूचित कर सकते हैं।
  • इस प्रकार अनुच्छेद 342 (1) के अनुसार केवल वे जनजातियाँ अनुसूचित जनजातियाँ मानी जाएगी जिनके बारे में राष्ट्रपति प्रारम्भिक सार्वजनिक अधिसूचना के जरिए तत्संबंधी घोषणा करेगें।
  • संविधान के अनुच्छेद 342 के अन्तर्गत 700 से अधिक जनजातियों को अधिसूचित किया गया है।

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Kartik Budholiya

Kartik Budholiya

प्रतियोगी परीक्षाओं के मार्गदर्शक Kartik Budholiya को मध्य प्रदेश की प्रशासनिक और सांस्कृतिक व्यवस्थाओं का गहन अनुभव है। वे MPPSC और अन्य राज्य स्तरीय परीक्षाओं के लिए सटीक विश्लेषण और प्रमाणिक अध्ययन सामग्री तैयार करने के लिए जाने जाते हैं।