गोंड जनजाति की सामाजिक परंपराएं | gond janjati ki samajik paramparayen

गोंड जनजाति की सामाजिक परंपराएं

गोंड जनजाति की सामाजिक परंपराएं
  1. जन्म संस्कार
  2. विवाह
  3. मृत्यु संस्कार

जन्म संस्कार

  • गोंड जनजाति में शिशु जन्म को शुभ माना जाता है।
  • जन्म के 6 दिन बाद शिशु को ध्रुवतारा दिखाया जाता है।
  • शिशु का 12 वें दिन नामकरण किया जाता है।

विवाह/विवाह प्रथाएँ

गोंड जनजाति में सगोत्र विवाह का प्रचलन नहीं है।
इनमें मुख्य रूप से दूध लौटावा, सेवा विवाह, पठौनी विवाह, चढ़ विवाह, लामसेना विवाह आदि का प्रचलन है।
इस जनजाति में विधवा विवाह और बहुविवाह प्रथा का भी प्रचलन है, इसमें विवाह विच्छेद तथा पुनर्विवाह की प्रथा भी विद्यमान है।

गोंड जनजाति में विवाह

दूध लौटावा
इसमें बुआ व मामा के लड़के लड़कियों का आपस में विवाह होता है।

चढ़ विवाह
इसमें दूल्हा बारात लेकर कन्या के घर जाता है।

सेवा विवाह
वधू मूल्य चुकाने में सक्षम न होने पर लड़का भावी ससुराल में अपनी सेवा देता है। वधू मूल्य को 'दूध बंक' कहा जाता है।
सेवा विवाह में वर को 'लामानाई' कहा जाता है।

पठौनी विवाह
इस विवाह में दुल्हन, दूल्हे के घर अपनी बारात लेकर आती है। वर्तमान में यह प्रथा बंद हो गयी है।

लमसेना विवाह
यह भी एक प्रकार का सेवा विवाह है जिसमें लड़का वधू के माता-पिता की सेवा करके प्रसन्न करता है।

हठ विवाह
इस विवाह में लड़की हठपूर्वक लड़के से विवाह करती है इसे भगेती विवाह भी कहा जाता है।

पोलीथर विवाह
यह विवाह एक प्रकार का अपहरण विवाह है इसे 'पायसोतुर' विवाह भी कहा जाता है।

प्रीति विवाह
इसमें लड़की के पिता को वधू मूल्य अनिवार्य रूप से देकर विवाह किया जाता है।

घोटुल प्रथा

यह आदिवासी युवा गृह संस्था है।
इसमें अविवाहित युवा विवाह पूर्व साथ में रह एवं यौन संबंध बना सकते हैं।

मृत्यु संस्कार

मृत्यु संस्कार के लिए विभिन्न प्रथाएँ जैसे पाटोप्रथा, खाहुलपाता, दशमानी, दसौंधी आदि का प्रचलन है।
  • पाटोप्रथा- इस प्रथा के तहत दशमानी में विधवा स्त्री को पंचो के सामने चूड़िया पहनाई जाती हैं।
  • दशमानी- यह गोंडो में मृत्यु के 10 दिन बाद होने वाली प्रथा है।
  • नवाखानी- गोंडो में पितरों की पूजा के त्यौहार को नवाखानी कहा जाता है।
  • खहुलपाता- अंतिम संस्कार के समय गाया जाने वाला मृत्युगान।

गोंड जनजाति की सांस्कृतिक परंपराएं

  • नृत्य
  • चित्रकला
  • भाषा
  • गीत/गान
  • उत्सव व पर्व

करमा नृत्य
यह गोंड जनजाति का प्रमुख नृत्य है जो महिलाओं द्वारा किया जाता है।
करमा कर्म की प्रेरणा देने वाला नृत्य है।
वर्ष 2016 में करमा नृत्य को गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड में शामिल किया गया।
स्त्री प्रधान नृत्य व प्रमुख वाद्य यंत्र मांदर का प्रयोग होता है।

सैला नृत्य
पहाड़ों पर किए जाने के कारण इसे सैला नृत्य कहते हैं।
यह नृत्य पुरुषों द्वारा किया जाता है।

बिरहा
बिरहा का बिरह से सम्बन्ध है। बारात जब दूल्हे के घर से चलती है तो रास्ते में दोहों के रूप में बिरहा गाए जाते हैं।
गीतों में अधिकतर लड़की के बिरह का वर्णन होता है।

भड़ौनी
यह विवाह नृत्य है, इसमें महिलाएँ मंडप के नीचे खड़े होकर बारात वालों को मीठे बोल में गाली देती हैं व नृत्य करती हैं।

सजनी
जब घरों में लड़की को ले जाने के लिए आते हैं उस समय घर के लोग खुशी से सजनी नृत्य करते हैं।

सुआ नृत्य
जब धान की फसल पककर तैयार हो जाती है उस समय सुआ नृत्य किया जाता है।

रीना
यह महिलाओं द्वारा दिवाली के अवसर पर किया जाता है।

कहरवा
यह नृत्य खुशी के अवसर पर किया जाता है।

अन्य नृत्य
गैंडी, दिवनी, दिवारी आदि

गोंड जनजाति से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य

  • गोंड जनजाति मध्य प्रदेश के लगभग सभी जिलों में पाई जाती है।
  • गोंड स्वयं को कोयातुर (कोई तोर) कहलाना पसंद करते हैं।
  • गोंड जनजाति का महत्वपूर्ण पेय पदार्थ पेज है।
  • गोंड जनजाति द्वारा की जाने वाली कृषि को बारी कहा जाता है।
  • गोंड जनजाति में रसोई घर को मूक्त घर कहा जाता है।
  • इस जनजाति में अतिथि के कमरे को पैठा बंगला कहा जाता है।
  • इस जनजाति के विवादों को सुलझाने के लिए समाधान पंचायत होती है जिसका मुखिया मांझी होता है
  • इनकी मुख्य भाषा गोंडी है इसके अलावा डोरली, हल्बी व भतरी भाषा भी बोलते हैं।

गोंड जनजाति के लोकगीत

ददरिया गीत
बारात के लोगों द्वारा रास्ते में इस गीत का गायन

करमा गीत
करमा नृत्य के समय गाया जाने वाला गीत

सैताम
प्रीतम का प्रियतमा पर प्रेम स्वरूप व्यंग

सजनी
समधी जब समधन के घर आता है तब ये गीत गाए जाते हैं।

कहरबा
बारात लौटते समय गाया जाने वाला गीत

नहडोरी गीत
बारात जाते समय गाया जाने वाला गीत

गोंडवानी
इसमें गोंड योद्धाओं की कथाएँ सुनाई जाती हैं।

जसगीत
किसी की बड़ाई व बखान करते समय गाया जाने वाला गीत

पंडवानी
इसमें भीम पर आधारित गीत गाए जाते हैं

सैला भडौनी
ये शादी विवाह में व्यंग्य स्वरूप गाए जाते हैं।

बिरहा गोंड आदिवासी जनजाति महिलाओं का लोकप्रिय लोकगीत है।

वाद्य यंत्र

गोंड जनजाति के प्रमुख वाद्य यन्त्रो में मांदर, टिमकी, सिंगबाजा, नगाड़े, मंजोरा, खरतान, ठिसकी, चुटकी, झाँझ, अलगोझा, तमूरा, किंदरी आदि

चित्रकला

  • गोंड जनजाति मे भित्ति चित्रकला का प्रचलन
  • नोहडोरा व डीगना कला प्रसिद्ध चित्रकला
  • चित्रकला के प्रसिद्ध व्यक्ति दुर्गाबाई, आनन्द सिंह, कलावती श्याम आदि

गोंडों की प्रसिद्ध चित्रकला

  • नोहडोरा - यह भित्ति चित्रकला है जिसमें महिलाएँ घर में मिट्टी से भित्ति चित्र बनाती है।
  • डीगनाकला - ये चित्र विवाह के समय बनाए जाते है। इसमें महिलाएँ घर की दीवार व फर्श पर मिट्टी व गोबर से चित्र बनाती है। इसमे चित्र मुख्यतः त्रिकोणीय व ज्यामितीय आकार के होते है। इसके प्रमुख कलाकार दुर्गाबाई श्याम, भज्जू सिंह श्याम, आनंद सिंह, जयगढ़ सिंह, धनइयांबाई व कलावती श्याम आदि हैं।

भाषा

  • गोंड जनजाति की मुख्य भाषा गोंडी है, इसके अलावा गोंडों द्वारा, डोरली, भतरी, हलवी आदि भाषा भी बोली जाती है।
  • गोंडी भाषा को मध्य प्रदेश सरकार अपनी पाठ्य पुस्तक निगम में वर्ष 2019 में शामिल किया।

उत्सव, पर्व एवं त्यौहार

गोंडों के प्रमुख उत्सव मड़ई, लारूकाज, मेघनाथ पूजा, बिदरी, हरियाली, नवाखानी आदि
मांडवरा त्योहार - गोंड जनजाति

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गोंड जनजाति का मड़ई उत्सव

मड़ई
यह गोंडों का प्रमुख पर्व है जो नवीन फसल आने के उत्सव में मनाया जाता है।
यह मुख्यतः मण्डला व डिंडोरी जिले में मनाया जाता है।

बिदरी
बिदरी का अर्थ है बादल। बिदरी में बादल के साथ ही अन्य देवताओं की भी पूजा की जाती है।
इसका उद्देश्य अच्छी फसल की कामना करना है। बिदरी पूजा में गांव के सभी लोग शामिल होते हैं।

लारूकाज
यह उत्सव गोंड आदिवासियों द्वारा नारायण देव के सम्मान में मनाया जाता है।
यह पर्व सूअर के विवाह का प्रतीक माना जाता है, इस उत्सव में सूअर की बलि दी जाती है।

मेघनाथ पूजा
मेघनाथ गोंडों के सर्वोच्च देवता है। मेघनाथ पूजा फागुन माह में की जाती है।

हरिढिली
श्रावण मास की अमावस्या को खरीफ की फसल बौने की समाप्ति पर मनाया जाता है।
इस दिन बैलों को हल से ढील दी जाती है एवं उनकी पूजा की जाती है।

नवाखानी
यह नवीन फसल एवं पितृ पूजा का त्यौहार है। यह त्यौहार प्रत्येक परिवार व्यक्तिगत रूप से भाद्र मास में अपनी सुविधा अनुसार मनाता है।
धनवाड़ी ग्राम का मड़ई मेला प्रमुख है।

छेरता
यह उत्सव पौष मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है
यह बच्चों का त्यौहार है।

जावरा
यह उत्सव कुवार एवं चैत्र मास में मनाया जाता है
जावरा उत्सव 9 दिन तक चलता है।

धार्मिक जीवन/मान्यताएँ

  • गोंड जनजाति अपनी उत्पत्ति लिंग देव से मानते है तथा उन्हें अपने आराध्य देव के रूप में पूजते हैं जिसे कोयापुनेम कहा जाता है।
  • गोंड जनजाति के मुख्य देवता बड़ा देव, दूल्हा देव, ठाकुर देव, बूढ़ादेव नारायण देव, मेघनाथ आदि हैं।
  • गोंड जनजाति में ओझा जादू टोने का कार्य करता है।
  • गोंडों के परम्परागत पुरोहित बैगा होते है तथा इस जनजाति के पुजारी को देवरी कहा जाता है।

गोंड जनजाति में मुख्य देवता

  • बड़ा देव- ये गोंडों के प्रमुख देवता हैं तथा इन्हे भगवान शिव का रूप माना जाता है
  • दूल्हा देव- यह बीमारियों को दूर करने वाले देवता हैं
  • ठाकुर देव- यह ग्राम देवता हैं जो ग्रामीणों की रक्षा करते हैं
  • नारायण देव- ये घर में आने वाली बाधाओं, बीमारियों, व भूत प्रेत आदि को रोकते हैं।
  • मेघनाथ- यह गोंडों के प्रमुख देवता हैं
  • खैर माई- खैर माई का स्थान गांव की सीमा पर होता है।
  • नागेश्वर देव- नाग या सर्प के देवता
  • खैर खूँट मुठिया देव- गायों के रक्षक देवता
  • शारदा माई- वरदान देने वाली देवी
  • बूढ़ी माई- बड़ी चेचक की देवी
  • कमलाई माई- ये छोटी माता की देवी हैं
  • मरही माता- हैजा और प्लेग बीमारियों की देवी
  • चौरंगा माई- पशुओं की बीमारी से संबंधित

जादू-टोना

जादू टोना के निवारक गुरू गोंड समाज में तीन हैं- (i) उमराव गुरू (ii) जलन्धर गुरू (iii) दौगुन गुरू

गोंडों का आर्थिक जीवन

  • मुख्य व्यवसाय - कृषि व पशुपालन
  • वन उपज संग्रह व मजदूरी का कार्य भी

ये मुख्यतः तीन प्रकार की कृषि करते हैं
  • (i) हरवाही- कम खेती होने पर की जाने वाली खेती
  • (ii) सियारी- खरीफ फसलों की खेती जिसमें धान, तिलहन, कोदो कुटकी रामतिला शामिल है।
  • (iii) उन्यारी- इसमें रबी की फसलों की खेती जैसे गेहूँ, चना, राई शामिल है।

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Kartik Budholiya

Kartik Budholiya

प्रतियोगी परीक्षाओं के मार्गदर्शक Kartik Budholiya को मध्य प्रदेश की प्रशासनिक और सांस्कृतिक व्यवस्थाओं का गहन अनुभव है। वे MPPSC और अन्य राज्य स्तरीय परीक्षाओं के लिए सटीक विश्लेषण और प्रमाणिक अध्ययन सामग्री तैयार करने के लिए जाने जाते हैं।