कर्म का सिद्धान्त
कर्म शब्द की व्युत्पत्ति एवं अर्थ
कर्म शब्द की व्युत्पत्ति 'कृ' धातु से हुई है जिसका अर्थ है करना, व्यापार या हलचल। अतः मानव जो भी करता है चाहे वह किसी प्रकार का कार्य हो 'कर्म' है।
सामान्यतः कर्म मनुष्य की वह शारीरिक अथवा मानसिक क्रिया है जो बाह्य या आंतरिक जगत में कोई परिवर्तन उत्पन्न करती है और जिसके फलस्वरूप स्वयं उसके लिए अथवा दूसरों के लिए कुछ दृश्य या अदृश्य परिणाम अनिवार्यतः उत्पन्न होते हैं।
श्रीमद्भगवद् गीता के अनुसार वह सभी क्रियाएँ कर्म हैं जो कायिक वाचिक व मानसिक हैं। कर्म मानसिक भाव व विचार के रूप में हो सकता है, वह शारीरिक क्रिया या गतिविधि के रूप में हो सकता है या कहे गये शब्द या संवाद के रूप में भी हो सकता है।
कर्म के तत्व
कर्म के तीन अनिवार्य तत्व हैं-
- कर्त्ता
- परिस्थिति और
- प्रेरणा
कर्त्ता के बिना कर्म संभव नहीं है साथ ही कर्त्ता, कर्म को किसी न किसी परिस्थिति में करता है उस परिस्थिति में कर्म करने हेतु उसे कोई न कोई प्रेरणा प्रेरित करती है। इन तीनों के माध्यम से ही कर्म संपादित होता है।
कर्म के प्रकार
कर्म को कई आधारों या दृष्टिकोण से वर्गीकृत किया गया है
इन आधारों को हम निम्न प्रकार से देख सकते हैं -
- मानव की इच्छा की दृष्टिकोण से
- फलाकांक्षा की दृष्टि से
- कर्म-फल प्राप्ति की दृष्टि से
- मीमांसा दर्शन के अनुसार
1. मानव इच्छा की दृष्टिकोण से
इस दृष्टिकोण से मानवीय कर्मों को सामान्यतः दो मुख्य वर्ग में विभाजित किया जाता है (i) अनैच्छिक कर्म (ii) ऐच्छिक कर्म
- अनैच्छिक कर्म- मनुष्य अपनी इच्छानुसार नहीं करता और इन पर उसका कोई नियंत्रण नहीं होता, जैसे- साँस लेना, हृदय धड़कना, पलक झपकना आदि। नैतिकता की दृष्टि से इनका कोई महत्व नहीं है।
- ऐच्छिक कर्म- ऐच्छिक कर्मों पर मनुष्य का पूर्ण नियंत्रण होता है जिन्हें करने या न करने के लिए उसे स्वतंत्र माना जाता है। ऐच्छिक कार्यों के लिए मनुष्य नैतिक रूप से उत्तरदायी तथा इनके लिए उसकी प्रशंसा या निंदा की जाती है।
2. फलाकांक्षा की दृष्टि से
दो वर्गों में विभाजित
(i) काम्य कर्म तथा (ii) निष्काम कर्म
- काम्य कर्म जिसे मनुष्य विशेष इच्छा या कामना से प्रेरित होकर करता है। यह सांसारिक और पार-लौकिक इच्छा दोनों हो सकती है। अपने लाभ या हित के लिए मनुष्य की कोई इच्छा या कामना ही समस्त काम्य कर्मों की मूल अभिप्रेरणा होती है।
- निष्काम कर्म वे हैं जिन्हें मनुष्य फलाशक्ति रहित होकर करता है अर्थात जिन्हें करते हुए वह स्वयं के लिए किसी प्रकार के लाभ की इच्छा नहीं करता केवल सामाजिक हित या लोक कल्याण की इच्छा से प्रेरित होकर किए गये कर्म ही निष्काम कर्म हैं।
3. कर्म-फल प्राप्ति की दृष्टि से
इस आधार पर मनुष्य के समस्त कार्य को तीन वर्गों में बांटा गया है-
- संचित कर्म
- प्रारब्ध कर्म
- संचीयमान कर्म
- संचित कर्म - जिसे मनुष्य पूर्व जन्म में कर चुका है और जिनके फल की प्राप्ति अभी आरम्भ नहीं हुई है। कर्म-सिद्धांत के समर्थकों के अनुसार ईश्वर भक्ति द्वारा इन कर्मों के फल में मनोवांछित परिवर्तन सम्भव है।
- प्रारब्ध कर्म - वह कर्म जो मनुष्य पूर्व में कर चुका है जिनका फल वह अभी भोग रहा है। संचित कर्म में से जितने कर्मों का फल भोगना पहले प्रारम्भ होता है, उतने अंश को प्रारब्ध कर्म कहते हैं।
- संचीयमान कर्म - वे कर्म जो मनुष्य अपने वर्तमान जीवन में कर रहा है जिनका फल उसे भविष्य में प्राप्त होगा। इन्हीं कर्मों के द्वारा वह अपने भावी जीवन अथवा भाग्य का निर्माण कर सकता है।
4. मीमांसा दर्शन के अनुसार
इसके अनुसार कर्म तीन प्रकार के माने गए हैं-
- काम्य कर्म
- निषिद्ध कर्म
- नित्य एवं नैमित्तिक कर्म
- काम्य कर्म- वे कर्म जिन्हें मनुष्य किसी विशेष कामना या इच्छा से प्रेरित होकर करता है।
- निषिद्ध कर्म- वे कर्म जो अनर्थ या दुख उत्पन्न करते हैं इसी कारण वेदों में इन्हें करना वर्जित माना गया है। दुःख तथा नरक से बचने के लिए इन कर्मों का परित्याग आवश्यक है।
- प्रतिदिन किया जाने वाला संध्या वंदन आदि नित्य कर्म है तथा विशिष्ट अवसरों पर किए जाने वाले श्राद्ध दान आदि कर्म नैमित्तिक कर्म हैं इनसे मनुष्य को पुण्य प्राप्त होता है।
कर्म सिद्धांत की आधारभूत मान्यताएँ
कर्म सिद्धांत को स्वीकार करने के लिए कम से कम दो आधारभूत मान्यताओं में विश्वास करना अनिवार्य है।
- प्रथम आधारभूत मान्यता - यह है कि सम्पूर्ण विश्व कारण-कार्य के नियम द्वारा ही शासित होता है। इस सिद्धांत के समर्थकों का मत है कि कारण-कार्य केवल भौतिक जगत की वस्तुओं पर ही नहीं अपितु मनुष्य के विचारों तथा कर्मों पर भी पूर्णतः लागू होता है।
- दूसरी आधारभूत मान्यता - मनुष्य के संकल्प-स्वातंत्र्य में पूर्ण विश्वास इस सिद्धांत के समर्थक 'कर्म' शब्द का प्रयोग ऐच्छिक कर्मों के अर्थ में ही करते है जिनके लिए संकल्प-स्वातंत्र्य को स्वीकार करना अनिवार्य है। यदि मनुष्य कर्म करने या न करने के लिए स्वतंत्र नहीं है तो उसे अपने कर्मों के लिए उत्तरदायी नहीं माना जा सकता। इस प्रकार मानवीय संकल्प-स्वातंत्र्य का विचार कर्म-सिद्धांत का अनिवार्य मूल आधार है।
कर्मवाद का आत्मा की अमरता तथा पुनर्जन्म सिद्धांत से संबंध
(कर्म से संबंधित स्थानांतरण का सिद्धांत)
- पुनर्जन्म का शाब्दिक अर्थ है - फिर से जन्म लेना परन्तु विचारकों के अनुसार इसका अर्थ 'किसी व्यक्ति का इस संसार में बार-बार जन्म ग्रहण करना' है। यह जन्म मरण का चक्कर मोक्ष प्राप्ति तक चलता रहता है।
- अधिकांश भारतीय दार्शनिकों के विचार में आत्मा अमर है अतः मृत्यु केवल शरीर की होती है आत्मा की नहीं। आत्मा एक शरीर का परित्याग करके दूसरा शरीर ग्रहण कर लेती है इसे ही पुनर्जन्म कहा जाता है।
- अधिकांश विचारकों का मानना है कि आत्मा अपने कर्मानुसार पुनर्जन्म ग्रहण करती है। अधिकांश दार्शनिक कर्मवाद, पुनर्जन्म सिद्धांत तथा आत्मा की अमरता इन तीनों सिद्धांतों को एक ही साथ स्वीकार करते हैं।
कर्म सिद्धांत की समस्याएँ
1. कर्मवाद के अनुसार सभी मनुष्य व अन्य प्राणी स्वयं अपने शुभ-अशुभ कर्मों के कारण ही सुख-दुःख भोग रहे हैं यदि कर्मवाद की इस मान्यता को स्वीकार किया जाए तो मनुष्य की इस स्थिति में परिवर्तन का प्रयास करना कर्मवाद के विरुद्ध व उनके प्रति अन्याय है।
2. कर्म-सिद्धांत पारलौकिक जीवन को सांसारिक जीवन की तुलना में अधिक महत्व देता है जिससे व्यक्ति आध्यात्मिक कल्याण में लग जाता है और सांसारिक दायित्वों के प्रति उदासीन हो जाता है।
3. कर्म-सिद्धांत में समाज में विद्यमान असमानताओं को तार्किक आधार मिलता है इसके अनुसार इस जगत में विभिन्न मनुष्यों में जो असमानताएँ पाई जाती हैं वे वस्तुतः अपने कर्मों के कारण ही हैं इस प्रकार कर्म सिद्धांतों को स्वीकारने के बाद समाज में विद्यमान असमानताओं को दूर करने का प्रयास व्यर्थ हो जाता है।
कर्म सिद्धांत का महत्व
- कर्मशीलता ही समस्त प्राणियों को निर्जीव वस्तुओं से अलग करती है। सम्पूर्ण जीवन मूलतः कर्म पर ही आधारित है।
- कर्म सिद्धांत मानव को नैतिक कर्तव्यों के पालन हेतु प्रेरित करता है।
- मानव को संतोष के साथ जीवन जीने की प्रेरणा देता है।
- परहित के कार्यों को करने के लिए प्रेरणा।
- सामाजिक जीवन में सुव्यवस्था व संगठन स्थापित करने में सहायक सिद्ध होता है।

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