षड्दर्शन | shad darshanas in hindi

षड्दर्शन

भारतीय परम्परा में चार पुरुषार्थ की बात की गई है, ये हैं-
  1. अर्थ - आर्थिक संसाधन
  2. धर्म - सामाजिक एवं नैतिक नियमों-कानूनों का पालन
  3. काम - शारीरिक सुखभोग
  4. मोक्ष - सांसारिक बंधन से मुक्ति
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ईसवी सन के आरम्भ तक भारत में 6 सम्प्रदाय विकसित हो चुके थे इन्हें ही षड्दर्शन कहा गया।
दर्शन प्रणेता
1- सांख्य महर्षि कपिल
2. योग महर्षि पतंजलि
3- न्याय गौतम
4- वैशेषिक कणाद
5- मीमांसा जैमिनी
6- वेदान्त महर्षि वादरायण

सांख्य दर्शन

यह भारत का प्राचीनतम दर्शन है। सांख्य दर्शन के सिद्धांतों का वर्णन ईश्वर कृष्ण की पुस्तक 'सांख्यकारिका' में मिलता है।

सांख्य के दो अर्थ हैं
संख्या तथा सम्यक ज्ञान। चूंकि सांख्य दर्शन में 25 तत्वों का विवरण मिलता है अत: इसे संख्या का दर्शन (Philosophy of Number) भी कहा जाता है।

सत्कार्यवाद
सत्कार्यवाद सांख्य दर्शन का आधारभूत सिद्धांत है। सत्कार्यवाद का अर्थ है कि कार्य अपनी उत्पत्ति के पूर्व कारण में विद्यमान (सत्) रहता है।
उदाहरणस्वरूप- बालू से तेल कदापि नहीं निकल सकता, तेल तिल से ही निकल सकता है क्योंकि तिल में तेल पहले से विद्यमान है।

सत्यकार्यवाद के दो भेद हैं-
  • परिणामवाद : इसके अनुसार कारण वास्तविक रूप में कार्य में बदल जाता है।
  • विवर्तवाद : इसके अनुसार परिवर्तन वास्तविक न होकर आभास-मात्र होता है
  • जैसे- रज्जु में सर्प का आभास होना।
  • सांख्य दर्शन प्रथम मत अर्थात परिणामवाद का समर्थक है।

योगदर्शन

  • शाब्दिक अर्थ मिलन अर्थात आत्मा का परमात्मा के साथ मिल जाना।
  • योग दर्शन का आधार ग्रंथ महर्षि पतंजलि द्वारा रचित 'योगसूत्र' है।
  • महर्षि पतंजलि ने शरीर, इन्द्रिय, मन पर नियंत्रण स्थापित कर पूर्णता प्राप्त करने के आध्यात्मिक प्रयास को योग बताया है।
  • योगदर्शन में सांख्य द्वारा प्रतिपादित 25 तत्वों के साथ-साथ ईश्वर के अस्तित्व को भी स्वीकार किया गया है। योग दर्शन सांख्य के विवेक ज्ञान को भी मानता है। इसी कारण योग दर्शन को कभी - कभी 'ईश्वर सांख्य' भी कहा जाता है।

न्याय दर्शन

  • आधारग्रंथ गौतम कृत 'न्यायसूत्र' है।
  • न्यायसूत्र पर वात्स्यायन ने 'न्यायभाष्य' नामक टीका लिखी है।
  • न्याय दर्शन में 16 पदार्थों या तत्वों का अस्तित्व स्वीकार किया गया है।
  • इसमें कहा गया है कि इनके सम्यक् ज्ञान के द्वारा ही अपवर्ग या मोक्ष प्राप्त हो सकता है।

वैशेषिक दर्शन

  • आधार ग्रंथ - वैशेषिक सूत्र इसका टीका - पदार्थ धर्म संग्रह
  • ये सात प्रकार के अस्तित्व को स्वीकार करता है। ये हैं- द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय, अभाव
  • इनमें प्रथम छ: को भाव पदार्थ कहा गया है।
  • वैशेषिक दर्शन ने भारत में भौतिकवाद का आरम्भ किया।
  • ये अज्ञान को ही बंधन का कारण मानता है।

मीमांसा दर्शन

  • वेद के दो भाग हैं - कर्मकाण्ड तथा ज्ञानखण्ड।
  • मीमांसा दर्शन का संबंध वेद के प्रथम भाग अर्थात कर्मकाण्ड से है इसलिए इसे 'पूर्व मीमांसा' भी कहा जाता है।
  • उद्देश्य - वैदिक कर्मकाण्डों के संबंध में निर्णय देना व उनकी दार्शनिक महत्ता को प्रतिपादित करना है।
  • आधार ग्रंथ - जैमिनीकृत 'मीमांसा सूत्र'
  • ये छः प्रकार के प्रमाणों को स्वीकार करता है। ये प्रमाण हैं- प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, उपमान, अर्थापत्ति, अनुपलब्धियाँ

प्रमुख दार्शनिक सिद्धांत
  • ज्ञान संबंधी - स्वतः प्रामाण्यवाद
  • भ्रम संबंधी - अख्यातिवाद (प्रभाकर का मत) विपरीत ख्यातिवाद (कुमारिल भट्ट का मत)

वेदांत दर्शन

इसको उत्तरमीमांसा भी कहते हैं।
आधार ग्रंथ - बादरायण कृत 'ब्रह्मसूत्र'

अष्टांग योग

पतंजलि द्वारा प्रतिपादित एक प्राचीन योग प्रणाली है, जिसमें आठ अंगों या चरणों का वर्णन किया गया है। यह योग की एक पारंपरिक और समग्र प्रणाली है, जो शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास के लिए है। अष्टांग योग के आठ अंग हैं:-
  1. यम (नैतिक आचरण)
  2. नियम (व्यक्तिगत अनुशासन)
  3. आसन (शारीरिक मुद्राएं)
  4. प्राणायाम (श्वास नियंत्रण)
  5. प्रत्याहार (इंद्रियों का नियंत्रण)
  6. धारणा (एकाग्रता-अन्तरंग साधना)
  7. ध्यान (मानसिक एकाग्रता)
  8. समाधि (आध्यात्मिक एकता)
अन्तःसाधना या अन्तरंग साधना एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति अपने आंतरिक स्वरूप को पहचानने और विकसित करने के लिए प्रयास करता है। यह साधना व्यक्ति को अपने मन, बुद्धि और आत्मा को शुद्ध करने और उन्हें एकाग्र करने में मदद करती है।

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Kartik Budholiya

Kartik Budholiya

प्रतियोगी परीक्षाओं के मार्गदर्शक Kartik Budholiya को मध्य प्रदेश की प्रशासनिक और सांस्कृतिक व्यवस्थाओं का गहन अनुभव है। वे MPPSC और अन्य राज्य स्तरीय परीक्षाओं के लिए सटीक विश्लेषण और प्रमाणिक अध्ययन सामग्री तैयार करने के लिए जाने जाते हैं।