मध्य प्रदेश अनुसूचित जनजाति आयोग
गठन
- मध्य प्रदेश राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग का गठन वर्ष 1995 में राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग अधिनियम, 1995 के अन्तर्गत एक सांविधिक निकाय के रूप में किया गया था।
- 24 मई 1995 को राज्यपाल से आयोग के गठन की अनुमति मिलने के बाद मध्य प्रदेश अनुसूचित जनजाति आयोग की स्थापना 29 जून 1995 को की गई।
- मुख्यालय - भोपाल
आयोग की संरचना
- आयोग में एक अध्यक्ष एवं दो अन्य अशासकीय सदस्य अर्थात कुल तीन अशासकीय (Non-official members) सदस्य होते हैं।
- अनुसूचित जनजाति विकास आयुक्त इस आयोग के पदेन सदस्य हैं।
- आयोग में दो सदस्यों का अनुसूचित जनजाति से होना अनिवार्य है।
- इसके अतिरिक्त आयोग में एक सचिव की नियुक्ति भी होती है।
नियुक्ति एवं सेवा शर्तें
मध्य प्रदेश अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा की जाती है।
कार्यकाल
आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों का कार्यकाल 3 वर्ष का होता है।
मध्य प्रदेश जनजाति विकास प्राधिकरण
- भारिया विकास प्राधिकरण क्षेत्र, छिन्दवाड़ा।
- बैगा विकास प्राधिकरण क्षेत्र, शहडोल, मण्डला, बालाघाट, डिंडोरी, अनूपपुर, उमरिया।
- सहरिया विकास प्राधिकरण क्षेत्र, ग्वालियर, श्योपुर, दतिया, भिण्ड, मुरैना, शिवपुरी, गुना, अशोकनगर।
अनुसूचित और जनजातीय क्षेत्र
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 244 (1) अनुसूचित क्षेत्रों को भारत के राष्ट्रपति द्वारा परिभाषित क्षेत्रों के रूप में परिभाषित करता है जो संविधान की पांचवी अनुसूची में उल्लिखित है। भारत में अनुसूचित क्षेत्रों वाले 10 राज्य हैं।
अनुच्छेद 244 अनुसूचित एवं जनजातीय क्षेत्रों से संबंधित हैं।
संविधान के अनुच्छेद 244 (2) के तहत छठी अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा मिजोरम राज्यों के उन क्षेत्रों से सम्बन्धित है जिन्हे 'आदिवासी क्षेत्र' घोषित किया गया है और ऐसे क्षेत्रों के लिए जिला या स्वायत्त परिषदों का प्रावधान है।
भारतीय संविधान की पांचवी अनुसूची
- इस अनुसूची के अन्तर्गत चार राज्यों (असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम) को छोड़कर किसी भी राज्य के अनुसूचित और जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन और नियंत्रण से सम्बन्धित प्रावधानों का उल्लेख किया गया है।
- राष्ट्रपति को किसी क्षेत्र को अनुसूचित क्षेत्र घोषित करने का अधिकार है।
- राज्य के राज्यपाल के परामर्श से राष्ट्रपति किसी अनुसूचित क्षेत्र की सीमा में परिवर्तन कर सकता है।
- अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन में केन्द्र व राज्य सरकार की अपनी भूमिका होती हैं, जबकि राज्यपाल को ऐसे क्षेत्र के प्रबंधन पर राष्ट्रपति को सालाना रिपोर्ट देनी होती है केन्द्र ऐसे क्षेत्र के प्रशासन में राज्य को निर्देश देता है।
- अनुसूचित क्षेत्रों वाले राज्यों के लिए एक जनजातीय सलाहकार परिषद आवश्यक है।
- इसमें 20 सदस्य होते है (जिसमें से तीन चौथाई उस राज्य विधान सभा में अनुसूचित जनजाति के प्रतिनिधि हैं।
- राज्यपाल अनुसूचित क्षेत्र के नियम व क्षेत्र में संशोधन कर सकता है लेकिन राष्ट्रपति की सहमति से।
- अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन व कल्याण पर रिपोर्ट करने वाला पहला आयोग 1960 में स्थापित किया गया था इसकी अध्यक्षता यूएन ढेबर ने की थी।
5वीं अनुसूचित क्षेत्र वाले 10 राज्य हैं-
- आन्ध्र प्रदेश
- मध्य प्रदेश
- छत्तीसगढ़
- महाराष्ट्र
- गुजरात
- ओडिशा
- हिमाचल प्रदेश
- राजस्थान
- झारखण्ड
- तेलंगाना
भारतीय संविधान की छठी अनुसूची
- यह अनुसूची पूर्वोत्तर के चार राज्यों के अनुसूचित और जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन और नियंत्रण से सम्बन्धित है जिन्हें पांचवी अनुसूची में शामिल नहीं किया गया है। ये राज्य असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम है।
- इन राज्यों में जनजातीय क्षेत्र 'स्वायत्त जिलों' के नाम से जाने जाते हैं। लेकिन राज्य के पास अभी भी उन पर अपना कार्यकारी अधिकार है।
- राज्य का राज्यपाल जनजातीय क्षेत्रों का नाम व सीमा बदल सकता है।
- एक स्वायत्त जिले में अलग-अलग जनजातियाँ हो सकती है जिन्हें बेहतर प्रशासन के लिए राज्यपाल द्वारा अलग-अलग स्वायत्त क्षेत्र में विभाजित किया जाता है।
प्रत्येक स्वायत्त जिले के लिए एक जिला परिषद है :
- इसमें 30 सदस्य होते है ।
- चार सदस्यों को राज्यपाल द्वारा मनोनीत किया जाता है - वे राज्यपाल की इच्छानुसार अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं।
- 26 सदस्य वयस्क मताधिकार का उपयोग करके चुने जाते हैं - उनका कार्यकाल पाँच वर्ष है।
पंचायत उपबन्ध (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम (पेसा), 1996
- पेसा अधिनियम 1996 में "पंचायतों से संबंधित संविधान के भाग IX के प्रावधानों को अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तारित करने के लिए" अधिनियमित किया गया।
- 24 दिसम्बर 1996 को भूरिया समिति की सिफारिशों के आधार पर अधिनियम को लागू किया गया।
- यह नियम मध्य प्रदेश में 15 नवम्बर 2022 को अधिसूचित किया गया।
- अनुच्छेद 244 (1) के अनुसार पांचवी अनुसूची के प्रावधान असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के अलावा अन्य राज्यों में अनुसूचित क्षेत्रों के अनुसूचित जनजातियों पर लागू होगें।
- पांचवी अनुसूची इन क्षेत्रों के लिए विशेष प्रावधानों की श्रृंखला प्रदान करती है।
- दस राज्यों - आन्ध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखण्ड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान और तेलंगाना ने पांचवी अनुसूची के क्षेत्रों को अधिसूचित किया है जो इन राज्यों में से प्रत्येक में कई जिलों (आंशिक या पूरी तरह से) को कवर करते हैं।
भारतीय संविधान मे अनुसूचित जनजातियों के लिए प्रावधान
- अनुच्छेद 15 (4) के अन्तर्गत राज्य द्वारा अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष प्रावधान किया जा सकता है।
- अनुच्छेद 16 (4) (क) व 4 (ख) द्वारा अनुसूचित जनजातियों को सरकारी नौकरियों, प्रोन्नति तथा बकाया रिक्तियों में आरक्षण दिया जा सकता है।
- अनुच्छेद 17 सामाजिक समानता के अन्तर्गत अस्पृश्यता के किसी भी रूप को स्वीकार नहीं किया जा सकता है। इस अर्थ में राज्य द्वारा प्रावधान बनाया जा सकता है।
- अनुच्छेद 46 राज्य को निर्देश देता है कि राज्य जनता के कमजोर वर्गों विशेषतया अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों की शिक्षा और धन सम्बन्धी हितों की अभिवृद्धि करेगा
- अनुच्छेद 164 के तहत छत्तीसगढ़, झारखण्ड, मध्य प्रदेश तथा उड़ीसा राज्यों में जनजातियों के कल्याण के लिए एक मन्त्री का प्रावधान किया गया है। 94 वें संशोधन 2006 से पूर्व इसमें बिहार भी शामिल था।
- अनुच्छेद 330 में अनुसूचित जाति व जनजाति के आरक्षण का प्रावधान है।
- अनुच्छेद 338 (A) के अन्तर्गत राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग का उल्लेख है।
- अनुच्छेद 366 (25) व अनुच्छेद 342 (1) यह केवल अनुसूचित जनजातियों को परिभाषित करने हेतु प्रक्रिया निर्धारित करता है।
- पांचवी व छठी अनुसूची में शामिल राज्यों के अतिरिक्त अन्य राज्यों के अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजाति के प्रशासन एवं नियंत्रण हेतु प्रावधान निर्धारित करती है।
- छठी अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम में जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन से संबंधित है।

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