वेद | Vedas in hindi

वेद

प्राचीन भारतीय साहित्य के अन्तर्गत धार्मिक एवं लौकिक साहित्य तथा विदेशी यात्रियों के विवरण शामिल हैं।
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  • धार्मिक साहित्य के अन्तर्गत ब्राह्मण साहित्य तथा ब्राह्मणेतर साहित्य को शामिल किया जाता है जबकि धर्मेत्तर साहित्य के अन्तर्गत ऐतिहासिक ग्रन्थ जीवन ग्रन्थ व अर्द्ध- ऐतिहासिक ग्रन्थ आते हैं।

वेद

वेद प्राचीनतम साहित्य है जिसका शाब्दिक अर्थ ज्ञान है। वेदों से प्राचीन आर्यों की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व धार्मिक स्थिति के बारे में जानकारी प्राप्त होती है।
भारतीय परंपरा वेदों को 'अपौरुषेय' अर्थात देवकृत मानती है।
श्रवण-परंपरा पर आधारित होने के कारण वेदों को श्रुति साहित्य भी कहा जाता है। कालांतर में लिपिबद्ध करने के कारण इन्हे संहिता कहा जाने लगा। ये 1500 ई.पू. से 500 ई.पू. के बीच संकलित किए गए थे।

वेदों के मुख्य प्रकार

वेदों की संख्या चार है-
  1. ऋग्वेद
  2. यजुर्वेद
  3. सामवेद
  4. अथर्ववेद

ऋग्वेद (1500 - 1000 ई.पू.)

ऋग्वेद की तिथि को लेकर विभिन्न विद्वानों के मध्य मतांतर है।
कुछ प्रमुख मत इस प्रकार हैं।
  • जैकोबी (जर्मन विद्वान) - 4520 ई.पू.
  • मैक्समूलर - 1200 - 1000 ई.पू.
  • विण्टरनित्स - 2500 ई.पू.
  • माइकल विट्ज़ेल - 1200- 1000 ई.पू.
मध्य एशिया के बोगजकोई से इण्डो - ईरानी भाषा का लेख मिलता है जिसकी तिथि ई.पू. 1400 है। ऋग्वेद तथा ईरानी ग्रंथ अवेस्ता की भाषाओं में काफी समानता है।
चारों वेद में ऋग्वेद सर्वाधिक प्राचीन वेद है इसकी रचना संभवतः सप्त सैंधव प्रदेश में हुई थी। संस्कृत साहित्य का प्रादुर्भाव ऋग्वेद द्वारा हुआ।

ऋग्वेद में तीन पाठ

(i) शाकल - इसमें 1017 सूक्त हैं

(ii) बालखिल्य - इसे आठवें मण्डल का परिशिष्ट माना जाता है, इसमें कुल 11 सूक्त हैं।

(iii) वाष्कल - कुल 56 सूक्त, परन्तु उपलब्ध नहीं
इसमें कुल 56 सूक्त थे, जो वर्तमान में पूरी तरह उपलब्ध नहीं हैं।
विभाजन: ऋग्वेद 10 मण्डलों और 8 अष्टकों में विभाजित है।
सूक्त: वर्तमान में उपलब्ध शाकल संहिता में 1017 सूक्त हैं और 11 बालखिल्य सूक्तों को मिलाकर कुल संख्या 1028 होती है।
मंत्र (ऋचाएँ): ऋग्वेद में मंत्रों की कुल संख्या लगभग 10,580 (विभिन्न गणनाओं के अनुसार 10,462 से 10,600 के बीच) मानी जाती है।
शाखाएँ: ऋग्वेद की मुख्य रूप से 5 शाखाएँ मानी जाती हैं: शाकल, वाष्कल, आश्वलायन, शांखायन और माण्डुकायन।
  • ऋग्वेद के प्रथम व दशम मण्डल को सबसे अन्त में जोड़ा गया है तथा दूसरे व सातवें मण्डल की ऋचाएँ सर्वाधिक प्राचीन हैं।
  • दसवा मण्डल सबसे बड़ा व द्वितीय मण्डल सबसे छोटा
  • तीसरा मण्डल - सूर्य देवता सावित्री को समर्पित गायत्री मंत्र उल्लिखित
  • सातवाँ मण्डल - अश्वमेघ यज्ञ का सर्वप्रथम उल्लेख
  • नवाँ मण्डल - सोम देवता का उल्लेख
  • दसवाँ मण्डल - सर्वप्रथम 'शूद्र' का उल्लेख , चातुर्वर्ण्य (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) का उल्लेख , पुरुषसूक्त इसी मण्डल में है।
  • ऋग्वेद के मंत्रों का उच्चारण करके जो पुरोहित यज्ञ सम्पन्न कराता था उसे होतृ (Hotre) ऋषि कहा जाता था।
  • प्रमुख विदुषियाँ - लोपामुद्रा, घोषा, शची, पौलमी, काक्षावृत्ति
ऋग्वेद के अंतिम सूक्त में 'संज्ञान' व समज्ञान नामक देवता को जनतंत्र का देवता कहा गया है।

ऋग्वेद मण्डल व उससे सम्बन्धित ऋषि

  • प्रथम - मधुच्छन्दा, दीर्घतमा
  • द्वितीय - गृत्समद
  • तृतीय - विश्वामित्र
  • चौथा - वामदेव
  • पांचवाँ - अत्रि
  • छठाँ - भारद्वाज
  • सातवाँ - वशिष्ठ
  • आठवाँ - कण्व ऋषि
  • नौवाँ - पवमान अंगिरा
  • दसवाँ - क्षुद्रसूक्तीय, महासूक्तीय

यजुर्वेद

यजु शब्द का अर्थ है- 'यज्ञ'
यजुर्वेद में यज्ञों को संपन्न कराने के लिए उपयोगी मंत्रों का संग्रह है।
अनेक प्रकार के यज्ञों को सम्पन्न कराने के नियमों व विधि-विधानों के संकलन मिलने के कारण इसे 'कर्मकाण्डीय वेद' भी कहा जाता है।
एकमात्र वेद जिसमें गद्य व पद्य दोनों हैं, गद्य को यजुष कहा गया है।
यज्ञ के अवसर पर मंत्रों का उच्चारण 'अध्वर्यु' पुरोहित द्वारा किया जाता है

यजुर्वेद के दो संस्करण
  1. कृष्ण यजुर्वेद -> छन्दोबद्ध मंत्र व गद्यात्मक वाक्य- मुख्य शाखा - तैत्तिरीय, काठक, कपिष्ठल, मैत्रायणी
  2. शुक्ल यजुर्वेद -> केवल सामान्य मंत्रों का समावेश- मुख्य शाखा - माध्यन्दिन और काण्व
शुक्ल यजुर्वेद में केवल मंत्र हैं जबकि कृष्ण यजुर्वेद में मंत्रों के साथ-साथ उनकी व्याख्या भी मिलती हैं।

सामवेद

साम का शाब्दिक अर्थ है - गान। सामवेद में मुख्यतः यज्ञों के अवसर पर देवताओं की स्तुति में गाये जाने वाले मंत्रों का संग्रह है। यज्ञ के समय गायन उद्गाता नामक ऋषियों द्वारा किया जाता था।
यह सभी वेदों में सबसे छोटा है। इसमें मूलतः 1549 ऋचाएँ हैं परन्तु कई ऋचाओं के पुनरावृति के कारण यह 1875 हो जाती है। इन ऋचाओं में 75 ऋचाओं के अतिरिक्त शेष सभी ऋग्वेद से ली गई हैं।
अधिकांश ऋचाएँ ऋग्वेद के आठवें व नौवें मंडल से लिए गए हैं।
सामवेद के प्रथम द्रष्टा 'वेदव्यास के शिष्य 'जैमिनी' को माना जाता है।

सामवेद की शाखाएँ ब्राह्मण (शाखा से संबंधित) उपनिषद (शाखा से संबंधित) सूत्र (शाखा से संबंधित)
कौथुमा - राणायनीय पंचविश (ताण्ड्य) ब्राह्मण छंदोग्य उपनिषद लाट्यायन और द्राह्याण
जैमिनीय जैमिनीय केन उपनिषद जैमिनीय उपनिषद जैमिनीय सूत्र

महर्षि पतंजलि के अनुसार सामवेद के 1000 शाखाएँ थी परन्तु वर्तमान में केवल तीन शाखाएँ उपलब्ध हैं:-
  1. कौथुमा
  2. जैमिनीय
  3. राणायनीय

सामबेद मुख्यतः दो भागों में विभक्त- (i) आर्चिक (ii) गान

(i) आर्चिक
  • पूर्वार्चिक
  • उत्तरार्चिक                 

(ii) गान
  • ग्राम गेय
  • अरण्य गेय

सामवेद का प्रमुख देवता 'सविता' या 'सूर्य' है। परन्तु इन्द्र, सोम का भी इसमें पर्याप्त वर्णन है।

अथर्ववेद

चारों वेदों में अथर्ववेद की रचना सबसे अंत में हुई। इस वेद की रचना 'अथर्वा ऋषि' के द्वारा की गयी थी। अतः अथर्वा ऋषि के नाम पर ही इसे अथर्ववेद कहा गया।

अथर्ववेद में
  • अध्याय - 20
  • सूक्त - 731
  • मंत्र - 5987/6000 हैं।

दो शाखाएँ
  • पिप्पलाद
  • शौनक

इसके लगभग 1200 मंत्र ऋग्वेद से लिए गए हैं।
  • इसमें रोग निवारण, तंत्र-मंत्र, जादू-टोना, वशीकरण, आशीर्वाद, स्तुति दीर्घायु , विवाह प्रेम , राजकर्म मातृभूमि महात्म्य आदि का वर्णन है।
  • रजत (चाँदी) का सर्वप्रथम उल्लेख अथर्ववेद में ही मिलता है अथर्ववेद में 'अरुंधति' नामक रोगनाशक जड़ी-बूटी तथा 'शल्य चिकित्सा' का उल्लेख मिलता है। वर्णाकूप तथा कुल्या (नहर) का भी उल्लेख हुआ है।
  • अथर्ववेद में ब्राह्मणों को 'भू-देव' कहा गया है।
अथर्ववेद में सभा और समिति को पृथक संस्थाओं के रूप में घोषित किया गया है।

वेदांग

वैदिक साहित्य की जटिलता को देखते हुए इसे आसानी से समझने के लिए एक नवीन साहित्य की रचना हुई जिसे 'वेदांग' कहा जाता है। वेदांग की संख्या छ: है जिसका ज्ञान वेद के यथार्थ ज्ञान के लिए आवश्यक है।

वेदांग वेद रूपी शरीर का अंग विषय
शिक्षा नाक वैदिक शब्दों के शुद्ध उच्चारण हेतु इसका निर्माण हुआ
कल्प हाथ वैदिक यज्ञों की व्यवस्था व गृहस्थाश्रम के लिए उपयोगी कर्मों के प्रतिपादन
व्याकरण मुख इसमें नाम व धातुओं की रचना एवं उपसर्ग, प्रत्यय, आदि के प्रयोग हेतु नियम वर्णित हैं।
निरुक्त कान वेद के कठिन शब्दों का संकलन 'निघण्टु' नामक ग्रन्थ से इन्हीं की व्याख्या के लिए 'यास्क' ने निरुक्त की रचना की
छंद पैर वैदिक मंत्र अधिकांशतः छंदों में बद्ध हैं अतः उनके ठीक ढंग से उच्चारण तथा पाठ के लिए छंदों का ज्ञान आवश्यक
ज्योतिष नेत्र यज्ञों से अभीष्ट फल प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक था कि उनका अनुष्ठान शुभ समय व मुहूर्त में किया जाए। ग्रहों तथा नक्षत्रों की स्थिति का अध्ययन करके वह समय ज्ञात किया जाता था।

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Kartik Budholiya

Kartik Budholiya

प्रतियोगी परीक्षाओं के मार्गदर्शक Kartik Budholiya को मध्य प्रदेश की प्रशासनिक और सांस्कृतिक व्यवस्थाओं का गहन अनुभव है। वे MPPSC और अन्य राज्य स्तरीय परीक्षाओं के लिए सटीक विश्लेषण और प्रमाणिक अध्ययन सामग्री तैयार करने के लिए जाने जाते हैं।