भीलों के प्रमुख पर्व एवं उत्सव | bhilo ke pramukh parv evam utsav

भीलों के प्रमुख पर्व एवं उत्सव

भगोरिया

  • होलिका दहन के समय मनाया जाने वाला यह पर्व सम्पूर्ण भील क्षेत्र में मनाया जाता है।
  • भंगोर देव के नाम पर यह पर्व भगोरिया नाम से जाना जाता है
  • यह मुख्य रूप से झाबुआ-अलीराजपुर में मनाया जाता है।
  • 7 दिन तक चलने वाला यह पर्व तीन भागों में मनाया जाता है।

(i) गुलालिया
इसमें विवाह हेतु इच्छुक युवक अपनी पसंद की युवती को गुलाल लगाकर प्रेम व्यक्त करता है, यदि युवती भी प्रतिक्रिया स्वरूप गुलाल लगा दे तो युवती की भी सहमति मान ली जाती है।

(ii) गोलगधेड़ो
इसमें लड़कियों का एक समूह लड़कों को घेरे रहती है यदि लड़का लड़की को भगा ले जाने में सफल हो जाता है तो स्वीकृति से विवाह कर दिया जाता है।

(iii) उजाड़िया
होली की समाप्ति पर उजाड़िया हाट का आयोजन किया जाता है जहाँ भील आदिवासी अपनी आवश्यकता का सामान खरीदते हैं।

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दिवासा पर्व

भील इन्द्र देवता को प्रसन्न करने के लिए श्रावण मास की अमावस्या को दिवासा मनाते हैं।

गल पर्व

यह होली के दूसरे दिन मनाया जाता है। गल नरसिंह भगवान का स्वरूप है जो सभी प्रकार की इच्छाओं को पूर्ण करता है।
भील गल देवता को पितृदेव भी मानते हैं।
भीलों का विश्वास है कि गल बाबा सभी रोगों को गला देते हैं।

नवणि

नवरात्र या नवणि भील का धार्मिक अनुष्ठान पर्व है जिसमें वह अपनी कुल देवी की पूजा करते हैं।

जातर पर्व

यह पर्व दो बार मनाया जाता है
मक्के की बुवाई के समय व पौधे कुछ बड़े होने के बाद।

नवई पर्व

नवई पर्व नए अनाज के उपयोग का उत्सव है इसमें भील लोग नए अनाज को पकाकर खाते हैं।

डोहा उत्सव

यह उत्सव दुधारू पशुओं के दूध को बढ़ाने के लिए और बछड़ो को असमय काल के ग्रास से बचाने के लिए खेड़ा देवी की अराधना में मनाया जाता है।
डोहा उत्सव मनौती से संबंधित है।

इंदल उत्सव

इसका आयोजन मनोकामना पूर्ति के लिए किया जाता है।
यह कार्तिक माह में मनाया जाता है।

भीलों का धार्मिक जीवन

  • विभिन्न देवी-देवताओं की पूजा।
  • आत्मवादी (भूत-प्रेत व आत्मा में विश्वास)।
  • प्रमुख देवता राजपंथा, बावदेव, चोराणमाता, गणेश, शंकर, हनुमान आदि।

भीलों के प्रमुख देवता

बावदेव
भील इन्हें इंद्र का रूप मानते हैं।
इन्ही की अराधना से वर्षा होती है।
प्रमुख देवता।

कुहाजादेव
पशुओं की रक्षा व सम्पन्नता के लिए।

गलदेव
नरसिंह भगवान का रूप जो सभी प्रकार की इच्छाओं को पूर्ण करता हैं।

राजपंथा
भीलों के सबसे शक्ति शाली देवता।

सावन माता और माल्या बाबा
कृषि व वन उपज की रक्षा हेतु खेतों में स्थापना।

हौवण माता
प्राकृतिक प्रकोप से रक्षा हेतु।

भेरूदेव
शक्ति के प्रतीक।
युद्ध विजय हेतु इनकी अराधना।

देसी भावर
संकट के समय इनकी अराधना।

जस्सा देवी
दिवाली में इनकी पूजा होती है।

घिरसरी/थंबोला
बाहरी प्रकोप से बचने के लिए घर के प्रमुख स्तम्भ के पास देव स्थापना की जाती है जिसे घिरसरी या थंबोला देव कहते हैं।

सोवण माता
पशुओं की रक्षा करने वाली देवी।

भैंसा देव
जानवरों की रक्षा हेतु इनकी अराधना

खोडियाल माता
विकलांगो को ठीक करने वाली देवी।

शीतला माता
यह बीमारियों से रक्षा करती है।

आर्थिक जीवन

  • भील जनजाति एक निर्धन जनजाति है जिसका मुख्य व्यवसाय कृषि है।
  • भील लोग स्थानांतरित कृषि करते हैं जिसे चिमाता कहा जाता है।
  • भीली भाषा मे इसे ढाह-ढिया कहा जाता है।
  • भील कृषि के अलावा मजदूरी व व्यवसाय का भी कार्य करते हैं।

अस्त्र-शस्त्र

भीलों के प्रमुख अस्त्र-शस्त्र धनली (धनुष) विलखी (बाण), बिटली (शिकारी बाण) फलिया (धारदार हथियार) आदि हैं।
निमाड़ निशाकर ने भील जनजाति को लड़ाकू जनजाति कहा है।
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Kartik Budholiya

Kartik Budholiya

मध्य प्रदेश की ऐतिहासिक विरासत, भूगोल, कला-संस्कृति और सामान्य ज्ञान के विशेषज्ञ Kartik Budholiya छात्रों को MPPSC, MPESB (Vyapam), MP Police, Patwari, Forest Guard और अन्य राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दिलाने के लिए निरंतर शोध-परक कंटेंट साझा करते हैं।