सभा समिति | Sabha Samiti

सभा समिति

सभा और समिति वैदिक कालीन महत्वपूर्ण राजनीतिक संस्थाएँ थीं अथर्ववेद में सभा और समिति को प्रजापति की दो पुत्रियाँ बताया गया है।
सभा और समिति राजा की निरंकुशता पर नियन्त्रण रखती थीं। राजा के अभिषेक के लिए इनकी स्वीकृति आवश्यक होती थी।
ऋग्वैदिक काल में सभा और समिति में महिलाओं की भागीदारी थी परन्तु उत्तर-वैदिक काल में सभा और समिति में महिलाओं की भागीदारी समाप्त हो गई।
sabha-samiti
सभा और समिति के स्वरूप एवं कार्य के संबंध में विद्वानों का मत
विद्वान मत
लुडविग • इनके अनुसार 'सभा' उच्च सदन थी, जिसमें पुरोहित तथा कुलीन लोग भाग लेते थे।
• जबकि 'समिति' निम्न सदन जिसमें सामान्य जन के प्रतिनिधि बैठते थे।
जिमर • 'सभा' ग्राम की संस्था थी तथा समिति सम्पूर्ण जन की केन्द्रीय समिति होती थी।
हिलब्रान्ट • समिति संस्था थी जबकि सभा उसकी बैठक स्थल।
के. पी. जायसवाल • समिति राष्ट्रीय संस्था जबकि सभा उसकी स्थायी समिति।
अल्तेकर • सभा प्राय: ग्राम संस्था जिसमें सामाजिक तथा राजनीतिक दोनों विषयों पर विचार।
• समिति का स्वरूप केन्द्रीय शासन की व्यवस्थापिका सभा के समान था।

सभा

ऋग्वेद में सभा का उल्लेख 8 बार तथा अथर्ववेद में 17 बार मिलता है कुलीन व वृद्ध जनों की सभा जिसमें उच्च कुल के लोग ही भाग ले सकते थे। सभा का शासन पर महत्वपूर्ण प्रभाव होता था।
सभा का प्रधान 'सभापति' कहलाता था। सभा के रक्षकों को 'सभापाल' और उसके सदस्यों को 'सभेय सभासद' या सभासीन कहा जाता था।
सभा में ग्रामीण मामलों पर चर्चा की जाती थी । सभा राजनीतिक तथा प्रशासनिक कार्यों के साथ-साथ न्यायिक कार्य भी सम्पन्न करती थी।
सभा की तुलना आधुनिक राज्यसभा से की जा सकती है ।

समिति

समिति का उल्लेख ऋग्वेद में 9 बार तथा अथर्ववेद में 13 बार हुआ है।
समिति जनसभा थी जिसमें विभिन्न कबीले व जनजाति के लोग जमा होते थे तथा जीवन से संबंधित विभिन्न विषयों पर चर्चा करते थे।
जनसाधारण की आवाज अभिव्यक्त करने वाली संस्था।
समिति का स्वरूप केन्द्रीय शासन की व्यवस्थापिका सभा के समान था।
इसमें दार्शनिक व धार्मिक विषयों पर चर्चा होती थी।

सभा और समिति में संबंध

प्रारम्भ में सभा और समिति में कोई अन्तर नहीं था दोनों की आर्यों की राजनीतिक संस्था के रूप में विशेष भूमिका थी।
ऋग्वैदिक काल के प्रारम्भ में दोनों ही संस्था चल (Mobile) प्रकृति की थीं जो अपने प्रमुख के नेतृत्व में सेना के साथ चलायमान रहती थीं।
सभा और समिति के मध्य मुख्य अंतर यह था कि सभा न्यायिक कार्यों को भी संपादित करती थी परन्तु समिति को न्यायिक अधिकार प्राप्त नहीं था।
कालांतर में सभा केवल कुलीनों की संस्था रह गई तथा समिति का अस्तित्व समाप्त हो गया।

Post a Comment

Post a Comment (0)

Previous Post Next Post
Kartik Budholiya

Kartik Budholiya

प्रतियोगी परीक्षाओं के मार्गदर्शक Kartik Budholiya को मध्य प्रदेश की प्रशासनिक और सांस्कृतिक व्यवस्थाओं का गहन अनुभव है। वे MPPSC और अन्य राज्य स्तरीय परीक्षाओं के लिए सटीक विश्लेषण और प्रमाणिक अध्ययन सामग्री तैयार करने के लिए जाने जाते हैं।